लोगों के दिलों में बसता हूं और क्या होता है जीना....कमल जोशी

Publish 04-07-2019 20:46:45


 लोगों के दिलों में बसता हूं और क्या होता है जीना....कमल जोशी

गढ़वाल (प्रमोद शाह): देखते ही देखते कमल जोशी को हमसे जुदा हुए 2 वर्ष हो गए और इन 2 वर्षों में लगातार किसी न किसी बहाने उनकी याद उनकी बात हमारे स्मृति पटल में बनी रही। कमल जोशी की यह बात ही कमल जोशी को अन्य लोगों से जुदा करती है। कमल जोशी के अलग-अलग रंग थे और हर आदमी उनके किसी एक खास अंदाज किसी एक खास रंग से परिचित होकर ही उनका मुरीद हो जाता था। किसी के लिए कमल जोशी एक बेहतरीन प्रकृति छायाकार थे, तो किसी के लिए वह मानवीय संवेदनाओं के चित्रकार थे।
मानवीय संवेदनाओं के जिन विभिन्न पहलुओं को उन्होंने अपनी  फोटोग्राफी से उकेरा वह अद्भूत था। किसी के लिए कमल जोशी एक घुमंतू पत्रकार यायावर ही थे, जो अपनी  रुखसांक व  मोटरसाइकिल से न जाने कितनी लंबी दूरियां तय कर लेते थे। यूं तो उनका पड़ाव कोटद्वार था, लेकिन कोटद्वार के लोग ही यह नहीं जानते थे कि आज कमल जोशी कहां होंगे। मन हुआ लंबी यात्रा में निकल गए और स्कूल जाते हुए बच्चों के साथ बच्चे बन गए, दूर कभी किसी बूढी मां का सहारा बन गए। कहीं किसी नदी किनारे साग भाजी का जुगाड़ कर लिया। वह जहां जाते वहां लोगों से मिलते बतियाते  जरूर थे। मानो उनके जिन्दगी के अनुभवों को निचौड़ लेेना चाहते थे। मकसद यही होता कि अधिक से अधिक लोगों से मिलकर जीवन के उनके पक्ष परेशानियां और अनुभव को अर्जित किया जाए।
 इन सब अर्जित अनुभवों को  लेकर वह समाज में बैठते थे। अपने लेखन में दिखाते थे। अपनी  फोटोग्राफी में दर्शाते थे। दरसल, उनकी पोटली बहुत बड़ी नहीं थी जो भी वह इकट्ठा करते थे उसे लोगों में बांट देते थे। यही बांट देना उनकी सबसे बड़ी खूबी थी। वह  रीढ़  वाले पत्रकार थे। सत्ता की चमक से उनका स्वाभाविक बैर था और यह भी कि अपने एम.एस.सी की पढ़ाई नैनीताल में करने के दौरान नैनीताल का जो सबसे विश्वसनीय और सक्रिय छात्र, समाजसेवी और बुद्धिजीवियों का जो वर्ग था उसके कमल जोशी ता उम्र सक्रिय सदस्य रहे। वह भले ही नैनीताल में नही रहते थे, लेकिन उनका मन  नैनीताल में हीं भटकता रहता था।
अस्कोट, आराकोट पदयात्रा अभियान के स्थाई सदस्यों में शामिल रहे, उमेश डोभाल स्मृति न्यास से लगातार जुड़े रहे और इसके हर  आयोजन में शामिल रहे। कमल जोशी जी के अधिकांश कुमायूं के मित्र  राजीव लोचन साह, शेखर पाठक जी शमशेर बिष्ट, हरीश पंत, थ्रीस कपूर जी गोविंद बल्लभ पंत राजू जी आदि नामों का स्नेह आशीर्वाद मुझे भी मिलता रहा और अपनी कोटद्वार तैनाती के दौरान कमल जोशी जी से मिलना हुआ। बातों का सिलसिला चलता रहा और पुराने संदर्भ भी याद किए जाते रहे।
लेकिन, मुझे कमल जोशी में हमेशा एक पहाड़ी नदी सी ताजगी दिखी, एक ऐसा व्यक्ति जो हमेशा व्यस्त और मस्त रहता था बौद्धिकता जिसके लिए ऐसा आवरण  कभी नहीं थी कि जो उन्हे आम राहगीरों से अजनबी बना दे। वह खुलकर हंसते और बहुत छोटी छोटी बातों में ठिठक भी जाते थे। यानी एक जीवंत संवेदना से भरा हुआ इंसान ! कमल जोशी के इस प्रकार असमय चले जाना एक बडा़ सामाजिक आघात है ।

  यह समय चक्र भी ना...। आज हम दूसरी बरसी में हैं।
तुम्हें याद करते हुए विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं...कमल दा...वही उन्मुक्त हंसी जिंदा रखना। म्हम सब में।

 

(नोट: लेखक पुलिस अधिकारी हैं। वर्तमान में नरेंद्र नगर CO हैं।)

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