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    जाने पूर्व मुख्यमंत्री पंडित नारायण दत्त तिवारी के बारे में कुछ रोचक बाते ...............

    19-10-2018 12:05:31

    देहरादून(प्रदीप रावत "रवांल्टा")|  स्वाधीन भारत में उत्तर प्रदेश की पहली विधानसभा में नारायण दत्त तिवारी सबसे युवा विधायक थे. जिस समय 1952 में वो नैनीताल विधानसभा क्षेत्र से जीत कर उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे थे, उस समय उनकी आयु मात्र 26 वर्ष थी. जब उन्होंने सदन में अपना पहला भाषण दिया तो विपक्ष क्या, सत्ता पक्ष के लोग भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके थे.


    नारायण दत्त तिवारी की खास बात थी कि वो कभी किसी को ना नहीं कह सकते थे. बीबीसी हिंदी से बात करते हुए एक जमाने में उनके सचिव रहे और बाद में रक्षा सचिव के पद से रिटायर हुए योगेंद्र नारायण बताते हैं कि जो भी व्यक्ति उनसे मिलने आता था, वो उससे मिलते जरूर थे. एक बार मैंने अपनी आँखों से देखा कि वो एक शख्स से हॉल में मिले, फिर दूसरे शख्स से अकेले में मिलने लॉबी में बढ़ गए. फिर उस को भी छोड़कर तीसरे शख्स से टॉयलेट के पास मिले और उससे मिलने के बाद दोबारा हॉल में वापस आ गए. स्वीडन के पूर्व प्रधानमंत्री ओलोफ पाम से नारायण दत्त तिवारी की गहरी दोस्ती थी. बहुत कम लोगों को पता है कि जब तिवारी उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य थे तो वो 1959 में स्वीडन में जाकर 6 महीनों के लिए वहां रुके थे और उन्होंने स्वीडिश भाषा पर महारत हासिल कर ली थी.


    उनकी जीवनी लिखने वाले दुर्गा प्रसाद नौटियाल लिखते हैं, साल 1983 में जब वो उद्योग मंत्री बने तो दोबारा स्वीडन गए. उन्होंने उस समय स्वीडन के प्रधानमंत्री ओलोफ पाम के निवास पर जाकर उनसे मुलाकात की. जब तिवारी 1959 में स्वीडन गए थे तो ओलोफ पाम सोशल डेमोक्रेटिक कांग्रेस के अध्यक्ष थे. पाम ने बहुत गर्मजोशी से उनका स्वागत किया. उनके हाथ में सीप की बनी एक चिड़िया थी, जिसका एक हिस्सा टूट गया था, लेकिन पाम उससे खेल रहे थे. अचानक उन्होंने तिवारी से पूछा, क्या तुम्हें याद है कि 25 साल पहले तुमने ये चिड़िया मुझे भेंट दी थी.मैंने इसे बहुत संभाल कर रखा लेकिन पिछले दिनों घर बदलते समय इसका एक हिस्सा चटक गया. इस बैठक के दौरान तिवारी पाम को श्योर एक्सीलेंसी कहकर संबोधित कहते रहे. पाम ने इसका विरोध किया और कहा कि वो उन्हें श्योर एक्सीलेंसीश् के बजाए भाई कहकर संबोधित करें. तिवारी ने हंसते हुए जवाब दिया अगर मैं ऐसा करता हूं तो मेरी बगल में बैठे हुए हमारे राजदूत कूटनीतिक शिष्टाचार तोड़ने के लिए मेरी शिकायत हमारे प्रधानमंत्री से कर देंगे.उसी यात्रा के दौरान एक भोज में जाने-माने अर्थशास्त्री गुन्नार मिर्डल मुख्य अतिथि थे और वां नारायण दत्त तिवारी ने अपना भाषण स्वीडिश में दिया था.


    नारायण दत्त तिवारी की एक और खूबी थी. वो शायद उन्होंने हेमवती नंदन बहुगुणा से सीखी थी. लोगों के नाम को कभी नहीं भूलना. वो चाहे क्लर्क हो या चपरासी, तिवारी उसे हमेशा उसके नाम से ही पुकारते थे. भीड़ में भी तिवारी जी लोगों को नाम से बुलाकर अपनी तरफ आकृष्ट कर लेते थे. न सिर्फ नाम बल्कि उसकी पूरी पृष्ठभूमि के बारे में तिवारी बाकायदा शोध करते थे. मसलन वो कहां का रहने वाला है? उसके कितने बच्चे हैं? उसकी पत्नी क्या करती है या उसके पिता क्या करते हैं? ये सभी बातें तिवारी के दिमाग रूपी कंप्यूटर में कैद रहती थीं. उनको ये पता होता था कि लोगों का दिल किस तरह से जीता जाए. मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रहते हुए नारायण दत्त तिवारी के बारे में ये मशहूर था कि वो रोज 18 घंटे काम करते थे. चाहे वो रात को 2 बजे सोने गए हों या सुबह 4 बजे, रोज 6 बजे उनकी आंख खुल जाया करती थी. वो अपने लॉन में कुछ देर टहलने के बाद लोगों से मिलने के लिए तैयार हो जाते थे.


    उनके प्रधान सचिव रहे योगेंद्र नारायण बताते हैं, वो बहुत थोड़े से नोटिस पर अक्सर दिल्ली चले जाया करते थे. एक बार मैं सचिवालय के पास मे फेयर सिनेमा हॉल में अपनी पत्नी के साथ एक फिल्म देख रहा था. अचानक मुख्यमंत्री ने मुझे बुलावा भेजा. मैंने अपनी पत्नी से कहा कि मैं थोड़ी देर में वापस आ जाऊंगा, इसलिए तुम फिल्म देखना जारी रखो. मैं थियेटर नहीं लौट सका क्योंकि तिवारी ने मुझसे उसी समय स्टेट प्लेन से दिल्ली चलने के लिए कह दिया. जाहिर है मेरी पत्नी बहुत नाराज होकर अकेली घर लौटीं.


    वरिष्ठ पत्रकार दिलीप अवस्थी बताते हैं, यूं तो नारायण दत्त तिवारी को बहुत कम गुस्सा आता था लेकिन वो किसी से नाराज हैं, इस बात की पहचान इस बात से होती थी कि वो उसे महाराज और भाई साहब या भगवन कहकर संबोधित करने लगते थे. वो उन चंद चीफ मिनिस्टर्स में से थे जो फाइल का एक-एक लफ्ज पढ़ते थे. उसको अंडरलाइन करते थे. फाइल पर लाल निशान सेक्शन अफसर के नहीं होते थे. वो खुद फाइल पर लाल निशान लगाया करते थे. इसलिए अफसरों के बीच में उनकी काफी हड़क और डर था. ये माना जाता था कि नारायण दत्त तिवारी को बेवकूफ बनाना आसान नहीं है.