मुझे बूढ़ी दीपावली/इगास/देवलांग की छुट्टी चाहिए

Publish 13-11-2018 15:52:39


मुझे बूढ़ी दीपावली/इगास/देवलांग की छुट्टी चाहिए

देहरादून (प्रदीप रावत "रवांल्टा") | ...क्या इस बार पूरे प्रदेश में इगास, बूढ़ी दीपावली, देवलांग की भी छुट्टी मिलेगी? क्या फूलदेई की भी छुट्टी होगी...? किसी को छुट्टी देने में कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन हमारी लोक संस्कृति से जुड़े त्योहारों की छुट्टी क्यों नहीं दी जाती...? ये सवाल किसी अकेले का नहीं है। ये सवाल पूरे पहाड़ का है या यूं कहें कि ये सवाल असल उत्तराखंड का है। ये सवाल उन परंपराओं का है, जिनके लिए पूरे प्रदेश में अगल-अलग मान्यताओं के आधार पर त्योहार मनाया जाता है। वीर माधो सिंह भंडारी का बलिदान भी तो याद कर लेते। गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक इगास मनाई जाती है। जिस जिले में सल्तनत बसती है, उस जिले में भी इगास मनाने वाले, बूढ़ दीपावली मनाने वाले और देवलांग मनाने वाले भी रहते हैं।
सरकारें चाहे जो भी हों, उनके लिए वोट से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं होता। वोटों की बस्ती के लिए सरकार अध्यादेश लाई। राजधानी बनाने के लिए तो किसी सरकार ने आवाज नहीं उठाई। रोजगार के सवाल पर हर सारका चुप क्यों हो जाती। पहाड़ के सांस्कृतिक आयोजनों को राजकीय मेला घोषित कर अधमरा कर पहले ही अधमरे हो चुके हैं। सरकार के लिए बाहर से आए हर समुदाय के त्योहार और संस्कृति मायने रखती है। लेकिन, उत्तराखंडियों के त्योहारों के लिए कभी कोई छुट्टी नहीं होती। आखिर क्यों...?
इस बात पर कोई ऐतराज नहीं है कि किस त्योहार पर छुट्टी घोषित की जाए, किस पर नहीं। उत्तराखंडियों को इस बात पर ऐतराज है कि उनके त्योहार पर क्यों नहीं छुट्टी दी जाती। आखिर सरकारें कब तक उत्तराखंडियों को इस तरह से दूर का समझती रहेंगे। सोशल मीडिया पर तो लोग यहां तक कह रहे हैं कि नेताओं के लिए उत्तराखंड के कोई मायने नहीं हैं। सत्ता में बैठे नताओं को केवल वोट का गणित नजर आता है।
सरकार का छुट्टी का आदेश आते ही सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा और दर्द छलक उठा। लोगों का कहना है कि सरकार को अगर छुट्टी करनी ही थी तो इगास या बूढ़ी दीपावली पर करते। फूलदेई पर क्यों नहीं छुट्टी करते। मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखा गया, फिर भी उस पर ध्यान नहीं दिया गया। देहरादून की अवैध बस्तियों पर केवल सत्ता ही नहीं, नौकरशाह भी मेहरबान हैं। असल मायने में कहें तो नौकरशाहों के इशोरों पर चलने वाली सरकार हर फैसला नौकरशाहों के डर से ही लेती है। नेताओं नब्ज दबाए नौकरशाह अपने इशारे पर किसी एक नेता को नहीं, बल्कि पूरी सरकार को ही नचा रहे हैं। नाचिए सरकार...। केवल नाचिए नहीं...। तांडव नृत्य कीजिए।

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