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उत्तराखंड चुनाव पर पड़ी पलायन की मार, युवा वर्ग उत्तराखंड से बाहर होने के कारण केवल 57% हुआ मतदान

12-04-2019 17:29:54

कोटद्वार /गढवाल(गौरव गोदियाल ) : पलायन एक गंभीर रोग की तरह बहुत बड़ी चिंता का विषय बनता जा रहा है वैसे तो उत्तराखंड में हर जगह पलायन की मार झेल रहा है किंतु उत्तराखंड के पौड़ी जिला इसमें अव्वल है ।यदि उत्तराखंड सरकार द्वारा गठित पलायन आयोग की रिपोर्ट की मानें तो पलायन का सबसे ज्यादा दंश पौड़ी जिले ने झेला है और बीते दस वर्षों में पलायन करने वालों में से 20 फीसदी से अधिक लोग इसी जिले के हैं। इतना ही नहीं, 2011 की जनगणना के अनुसार, पौड़ी और अल्मोड़ा ही ऐसे दो जिले थे जहां जनसंख्या को घटते स्तर पर दर्ज किया गया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य से कुल जितने लोगों ने पलायन किया है उनमें से 20 प्रतिशत से ज्यादा ने लोगों ने पिछले एक दशक में पलायन किया और इनमें भी ज्यादातर ने रोजगार की तलाश में अपना घर छोड़ा।मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत द्वारा गठित ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि पलायन का सबसे ज्यादा दंश नैसर्गिक सौंदर्य से ओतप्रोत पौड़ी जिले ने ही झेला है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, पौड़ी और अल्मोड़ा, इन दोनों जिलों में जनसंख्या में कमी दर्ज की गई थी। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 10 सालों में पौड़ी से 25,584 व्यक्ति स्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं। यह आंकड़ा, राज्य से पलायन करने वाले कुल व्यक्तियों की संख्या के 20 फीसदी से भी ज्यादा है । पिछले 10 सालों में पौड़ी से अस्थायी रूप से पलायन करने वालों की संख्या 47,488 है।रिपोर्ट में यह भी  साफ तौर पर कहा गया है कि जिले से पलायन करने वालों में से 52.58 फीसदी लोगों ने अपना घर छोड़ने की मुख्य वजह आजीविका के साधन का न होना बताया है। केवल 15.78 फीसदी लोगों ने शिक्षा सुविधाओं तथा 11.26 फीसदी ने स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव को अपने पलायन का मुख्य कारण बताया है।यही वजह रही कि इस बार लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड पर पलायन की मार पडी ।सारा युवा वर्ग उत्तराखंड से बाहर होने के कारण केवल 57% मतदान ही सम्भव हो सका ।
जहाँ उत्तराखंड अपनी नैसर्गिक सुंदरता के लिए के लिए जाना जाता है जहां एक ओर उसके पास ऊंचे ऊंचे पहाड़ ,पर्वत मालाएं वाला क्षेत्र हैं ।तो दूसरी ओर मैदानी क्षेत्र भी है।कई दर्शनीय स्थल हैं तो अति पवित्र तीर्थ धाम भी हैं।कहीं कल कल बहती नदियां हैं,तो कहीं ऊंचे ऊंचे हिमशिखर।सचमुच यह उत्तराखंड अद्भुत ,अकल्पनीय, अतुलनीय है।फिर भी यहां पलायन मुख्य समस्या हो गई है।लोग अपने सुंदर सुंदर हरे भरे गांवों को छोड़कर मैदानी क्षेत्रों की तरफ बढ़ रहे हैं।जहां एक और पहाड़ों में गांव के गांव खाली हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर मैदानी क्षेत्रों में हर दिन जनसंख्या का बोझ बढ़ता जा रहा है जिससे मैदानी क्षेत्रों में भी मूलभूत सुविधाओं में कमी शुरू हो गई है।हर दिन वीरान होते गांव ,खंडर होते मकान पहाड़ों की दुर्दशा को बयान करते हैं ।
पलायन के कुछ मुख्य कारण हैं मूलभूत सुविधाओं का अभाव जैसे सड़क ,बिजली, पानी ,स्वास्थ्य ,शिक्षा ,युवाओं के लिए रोजगार का ना होना ।किसानों के फसलों का उचित मूल्य ना मिलना,मौसम चक्र में आए बदलाव के कारण वक्त पर बारिश ना होना और बेवक्त की बारिश से फसलों का नुकसान होना,किसानों को आधुनिक व वैज्ञानिक तरीके से खेती की जानकारी ना होना ,दूरसंचार व यातायात के साधनों में कमी होना ,स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, महिलाओं को लेकर कोई ठोस योजना नहीं और इन सब में रही सही कसर बंदर,लंगूरो व सुअरों ने पूरी कर दी जो आए दिन गांव में आकर पूरी की पूरी फसलों व फल फूल के पेड़ों को नष्ट कर देते हैं।
शिक्षा किसी भी समाज व उसकी भावी पीढ़ी के सुनहरे भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।लेकिन पहाड़ों में शिक्षा का स्तर बहुत निम्न है ।दूरस्थ व दुर्गम इलाकों में छोटे बच्चों की शिक्षा के लिए कोई सुविधा या व्यवस्था नहीं है।बच्चों को कई किलोमीटर की दूरी तय कर विद्यालयों में पहुंचना पड़ता है इस वजह से कई बच्चे स्कूल भी नहीं जा पाते हैं।ऊपर से विद्यालयों की हालत बहुत खराब है,शिक्षा का स्तर निम्न कोटि का है।बच्चों के बैठने के लिए व्यवस्था नहीं है।तथा उनको समय से कॉपी किताब भी उपलब्ध नहीं हो पाते हैं इसलिए कई लोगों ने अपने बच्चों की पढ़ाई तथा उनके भविष्य को देखते हुए मजबूरन गांव छोड़ दिया हैं।
दूसरी समस्या रोजगार है।जब स्कूल ही सही नहीं होंगे व शिक्षा व्यवस्था ही उचित नहीं होगी तो बच्चे कैसे काबिल होंगे । फिर युवाओं को रोजगार कहां से मिलेगा ? सरकार की तरफ से कोई ठोस योजना रोजगार के लेकर नहीं है ।इसलिए पहाड़ का युवा या तो फौज में भर्ती हो जाता है।या फिर अपना गांव छोड़कर दूर शहर में छोटी मोटी नौकरी करने को मजबूर होता है।कई युवा तो रोजगार ना मिलने की वजह से निराशा के गर्त में पहुंच जाते हैं जहां से वह शराब और नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं ।
आज के युग में भी गांव में मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं ।जैसे बिजली व सड़क ..कई गांव में तो अभी भी बिजली व सड़क नहीं पहुंची है ।दूर संचार के कोई साधन नहीं है।कई गांवों में तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी उपलब्ध नहीं है।अगर किसी गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है भी तो वहां पर डॉक्टर और दवाइयों की भारी कमी है ।अगर कोई व्यक्ति बीमार हो जाता है तो आज भी डोली में बिठाकर कई किलोमीटर की दूरी तय कर सड़क तक पहुंचाया जाता है।जहां से उसे किसी नजदीकी अस्पताल में ले जाया जाता है।कई बार तो इस पूरी प्रक्रिया में इतनी देर हो जाती है कि मरीज की जान खतरे में पड़ जाती है ।महिलाओं की स्थिति तो और भी खराब है उनको हर दिन पहाड़ जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।क्योंकि पहाड़ में महिलाओं को घर परिवार, बच्चों की देखभाल के साथ-साथ खेती करना ,पशु पालना, व जंगल से लकड़ी लाना, घास काटना,खाना बनाना,पानी लाना जैसी जिम्मेदारियां का निर्वहन करना पड़ता है।जो उनकी जिंदगी को अत्यधिक कठिन बना देता है ।
पहाड़ों को प्राकृतिक आपदाएं भी झेलनी पड़ती हैं पहाड़ के कुछ इलाके तो भूकंप की दृष्टि से अति संवेदनशील हैं ।मालपा जैसी त्रासदी हम देख चुके हैं। साथ ही साथ बादल फटना,भारी वर्षा होना ,हिमपात होना ,भूस्खलन व (केदारनाथ में आई आपदा, कोटद्वार में विगत दो बर्षों से आ रही बाढ) प्राकृतिक आपदाएं भी इस क्षेत्र में आती रहती हैं जिस वजह से जान-माल व वन संपदा को अत्यधिक नुकसान होता है।
पूरा हिमालय क्षेत्र असंख्य जड़ी बूटी व आयुर्वेदिक दवाइयों से भरा है इनमें से कई जड़ी बूटियां तो हमारे दादा परदादा के जमाने से बीमारियों को ठीक करने में काम में लाई जाती लेकिन इन जड़ी बूटियों का दोहन तथा उनको बाजार तक पहुंचाने के लिए सरकार के पास कोई ठोस नीति नहीं है इसी तरह पहाड़ में होने वाली अनेक फ़सलों व फलों को बाजार दिलाने के लिए भी सरकार उदासीन रहती है जिस वजह से किसानों को उनका लागत मूल्य भी नहीं मिल पाता।
पहाड़ की सांस्कृतिक धरोहर तथा यहां के तीर्थ स्थान दुनिया भर में लोगों के आकर्षण व उत्सुकता का केंद्र हैं । एक से एक सुंदर व अद्भुत दर्शनीय स्थल होने के बावजूद भी पर्यटन की या पर्यटकों की संख्या बढ़ाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।पलायन के कारण तो और भी कई है लेकिन खाली बैनर लगा देने से ,घोषणाएं कर देने से ,चुनाव में जीत निश्चित करने के लिए हवाई वादे कर देने से या बड़ी बड़ी रैलियां निकाल देने से पलायन की समस्या नहीं हल हो सकती।उसके लिए जरूरी है ठोस कदम उठाने की।जरूरत है बस एक इमानदार सरकार की ,एक ईमानदार जनप्रतिनिधि की और एक कारगर योजना की।और सबसे ऊपर एक दृढ़ संकल्पित जनमानस की। फिर किसी को यह नही कहना पड़ेगा कि “ पहाड़ का पानी पहाड़ की जवानी” दोनों पहाड़ के काम नहीं आ रहे है ।