हिमालयी राज्यों से हो देश का अगला प्रधानमंत्री

Publish 08-04-2019 21:07:44


हिमालयी राज्यों से हो देश का अगला प्रधानमंत्री

गढ़वाल (सुभाष चन्द्र नौटियाल): भारत का भाल हिमालय न सिर्फ इस देश का रक्षक है अपितु चराचर जगत का जीवनदायनी हिमालय अमिट मानवीय संस्कृति का वाहक भी रहा है। ठोस रुप में अकूत जलराशि का भण्डार हिमालय देश की पचास फीसदी आबादी की ना सिर्फ प्यास बुझाता बल्कि अन्न-जल सहित दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी करता है। पृथ्वी के जलवायु सन्तुलन में अहम भूमिका निभाने वाला हिमालय आदिकाल से ही अनेक ऋषि-मुनियों की साधनास्थली रही है। साधना के तपोबल से इन ऋषियों ने हिमालयी मानव संस्कृति के विकास में नये आयाम स्थापित किये हैं तथा साथ ही जीवन जीने की प्राकृतिक पद्वति की सुलभ राह सम्पूर्ण मानव समुदाय को उपलब्ध करायी।

जैसे-जैसे मानव का विकास क्रम आगे बढ़ता गया तो मानव के बढ़ते लोभ, लालच, भय तथा आरामप्रस्त सुविधाभोगी जिन्दगी की चाह से भोगवादी संस्कृति का उदय हुआ। मानव की बढ़ती लिप्सा के कारण वह प्रकृति का निर्ममतापूर्वक दोहन करने लगा। प्रकृति से आत्मसात् करने के लिए जो नीति-रीति ऋषि-मुनियों ने निर्धारित की थी उसका खुला उल्लंघन होने लगा जिसके परिणाम स्वरुप प्रकृति कुपित हो उठी, आज प्रकृति का यही स्वरुप प्रदूषण (वायु,जल,मृदा,ध्वनि आदि) के रुप में वर्तमान मानव के सम्मुख विकराल समस्या के रुप में है। सामुदायिक टकराव, वैमस्यता व्यक्तिवादी सोच से उपजी स्वार्थपरता जैसे सामाजिक प्रदूषण आज सम्पूर्ण विश्व में तांडव मचा रहे हैं। समस्या के समाधान के लिए विश्व का मानव एक बार पुनः हिमालय से आस लगाये बैठा है। आज जबकि वह हिमालय से समाधान की आस कर रहा है तो हिमालयी संस्कृति को समझने की आवश्यकता है परन्तु वर्तमान समय में वह हिमालय तथा हिमालयी संस्कृति दोनों को ही उपेक्षा भाव से देख रहा है। इसी उपेक्षित भाव के कारण अपसंस्कृति के जहर से सम्पूर्ण पृथ्वी पर अस्तिव  का संकट पैदा हो गया है।  हिमालय की पवित्र धाराओं से ही भारतीय संस्कृति का जन्म हुआ है तथा इसी संस्कृति के कारण हम सम्पूर्ण विश्व में जगतगुरु कहलाये हैं। आज बिगड़े प्रकृति सन्तुलन के कारण हिमालय की चिन्ता तो की जा रही है परन्तु हिमालय की चिन्ता सिर्फ बर्फ से लकदक चोटियों, हिमनद और सदानीरा नदियां ही नहीं हैं। बिना हिमालयी संस्कृति से आत्मसात् किये हिमालय की चिन्ता व्यर्थ है।
दरअसल, हिमालय की सम्पूर्णता उस समाज, संस्कृति, सामाजिक जीवन की नीति-रीति और परम्पराओं से है जो यहां बसी आबादी के तौर पर बास करती है तथा उनकी संस्कृति धाराओं में प्रवाहित होता है। उसका सबसे पहला प्रहरी और चिन्तक यहां बसने वाला समाज ही है। यहां प्रवाहित होने वाली संस्कृति तथा समाज की चिन्ता किये बिना हिमालय की चिन्ता करना बेमानी है। यदि भारत के भाल हिमालय संरक्षण के प्रति गम्भीर होना है तो यहां की संस्कृति से आत्मसात् करने की आवश्यकता है।
देश की आजादी के पिछले बहत्तर सालों में मैदानों की प्रकृति को समझने वाले तथा सागर की गहराइयों को महसूस करने वाले व्यक्तियों ने देश का प्रतिनिधित्व किया है परन्तु अभी तक देश को कोई भी ऐसा प्रतिनिधित्व नहीं मिला जो हिमालय की ऊंचाईया को महसूस करते हुए उसकी संस्कृति में रचा बसा हो। अब जबकि सत्तरहवीं लोकसभा का चुनाव प्रगति पर है तो देश के मतदाताओं को यह निर्णय लेने की आवश्यकता है कि देश का प्रतिनिधित्व ऐसे हाथों में होना चाहिए जो भारत के भाल हिमालय की प्रकृति को समझते हुए भारतीय संस्कृति का प्रसार सम्पूर्ण विश्व में कर सके। यह तभी सम्भव है जब वह प्रतिनिधि भारत, भारतीय, भारतीयता की गहरायी से समझ रखता हो तथा हिमालय में रचा बसा हो।
भारत में ग्यारह हिमालयी राज्य जम्मू कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखण्ड, सिक्किम, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, मणिपुर आते हैं। हिमालयी राज्यों का क्षेत्रफल 5 लाख 93 हजार वर्ग किलोमीटर है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार यहां 7 करोड़ 51 लाख 58 हजार लोग बसते हैं। 52 जिलों वाले हिमालयी राज्य में 40 लोकसभा सदस्य हैं। ज्ञात हो कि हिमालय प्रतिवर्ष दस करोड़ घनमीटर पानी एशिया महाद्वीप को देता है। उत्तर भारत की नदियों में सालाना छः सौ पचास घनमीटर पानी हिमालयी स्रोतों से आता है। भारत में 2400 किमी का क्षेत्र है तथा इसका विस्तार 300 किमी तक है। हिमालयी राज्यों के सन्साधनों का तो जम कर उपयोग किया जाता रहा है परन्तु देश का प्रतिनिधित्व करने का सौभाग्य अभी तक हिमालयी राज्यों नसीब नहीं हो पाया है। विश्व कल्याण तथा देशहित में इस पर गम्भीर चिन्तन की आवश्यकता है ताकि हिमालयी राज्यों को भी देश के प्रतिनिधित्व का अवसर प्राप्त हो सके।

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