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महात्मा गाँधी की 150 वीं जयंती : गाँधी दर्शन से सीख लेंने की जरूरत

28-09-2019 12:56:40

पैठाणी/गढ़वाल (देव कृष्ण थपलियाल): इस दो अक्टूबर को देश ’राष्ट्रपिता’ महात्मा गाँधी के 150 वर्ष पूरे होंनें पर जश्न मनानें की तैयारी कर रहा है, हालॉकि ये तैयारियॉ और उत्सव का माहौल माह सितम्बर के मध्य से ही प्राराम्भ हो गये हैं, हर व्यक्ति, संस्था, आदोंलनकर्ता व गाँधीवदियों नें  अपनें-अपनें तरीकों से महात्मा गाँधी को भावभीनी श्रंद्वाजंलि देंना शुरू कर दिया है, देश के बडे-छोटे-मझोले मीडिया संस्थानों (प्रिंट/इलैक्ट्रानिक) नें बापू के जीवन-दर्शन को लेकर  व्यापक बहस, लेख-आलेख, चर्चा-परिचर्चा, चिंतन-प्रवाह जैसे कार्यक्रमों की श्रृंखलाऐं की शुरूवात कर दी हैं।  वास्तव में यह क्षण प्रत्येक देशवासी के लिए गौरवान्वित करनें का समय है। एक महात्मा को याद करनें का समय है, जो इस माटी की गोद में पैदा हुआ था, तथा अपनें व्यक्तित्व व कृतित्व के माध्यम से वह विश्व के प्रेरणास्रोत बनें।  महात्मा गाँधी एक व्यक्ति न होकर एक विचार/एक संस्था है, जिसनें न केवल अपनें देश को परतंत्रता की बेडियों से मुक्ति दिलाई अपितु सम्पूर्ण मानवजाति का भी शुद्वीकरण किया । देश को जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, भाषा, अंधविश्वास, तथा रूढिवादिता की संर्कीण गलियारों से मुक्त करानें, के लिए गाँधी जी नें अपना संम्पूर्ण जीवन खपा दिया। यह वह समय था जब देश अंधविश्वास, रूढिवादियों, गरीबी और दरिद्रता के मकडजाल में उलझा हुआ था, छुआछुत के नाम पर मनुष्य का मनुष्य के साथ भेदभाव अपनें चरम पर था, आपसी घृणा, रागद्वेष और मतभेद के कारण लोंगों में ’एका’ नाम की कोई चीज नहीं थीं । कुछ दकियानुसी मान्यताओं के ठेकेदार अपनीं सल्तनत बेलगाम चलाते रहे, जिसका फायदा तत्कालीन अंग्रेजी हुकुमत के हुकमरान लेते रहे। 

देव कृष्ण थपलियाल

ऐसे में बापू नें कई मोर्चों पर एक साथ लडाई लडी और जीत हासिल कीं, हिन्दु-मुसलमानों के बीच आये-दिन सॉम्प्रदायिक तनावों की आग को सुलगानें में अंग्रेजों नें कोई कोर-कसर नहीं छोडी ? कई जाति-वर्गों में विभाजित हिन्दु धर्मावलम्बियों नें भी इसमें घी डालनें का काम किया ? कभी-कभी इन आग की लपटों नें हाथ में आई ’स्वतंन्त्रता’ को भी कोंषों दूर छिटका दिया । बाद के दिनों में हिन्दु-मुसलमान की इस खाई नें राष्ट्र के दो टुकडे करके ही दम लिया ? जो देश के लिए आज भी नासूर का काम कर रहा  है। भारत-पाकिस्तान के झगडों नें मानों देश ऐसा बीज बो दिया है, जो कभी खत्म न होंनें वाली कहानीं बन गये हैं ? दो पृथक राष्ट्र होंनें के बावजूद भी पाकिस्तान में बैठे हुक्मरानों के दिलो-दिमाग में हिन्दुस्तान के प्रति खुरापात आतंकवाद को प्रश्रय तथा देश में चोरी-छुपे दशहत फैलानें की कोशिशें समय-समय पर सामनें आती रहती है। इन दिनों भारत की प्रगति और केद्र बैठी नरेन्द्र मोदी सरकार के कुछ ’अहम’ और ’दमदार’ फैसलों की नजर में यह ’मुल्क’ कुछ ज्यादा ही परेशान और विचलित है ? वहॉ के हुक्मरानों को अपनें देश की मुफलिसी, बेरोजगारी नहीं दिखती पर भारत के खिलाफ विषवमन उनकी आदतों में सूमार है, हालॉकि पाकिस्तान द्वारा युद्व और ‘परमाणु बम’ के इस्तेमाल की धमकी अब किसी भी हिन्दुस्तानी को विचलित नहीं करती, बल्कि दुगुनें वेग वह उत्साहित हो जाता है।

महात्मा गाँधी जी नें पूरी दुनियॉ में मानवता का सशक्त संदेश देकर मनुष्य के जीवन को सहज, सरल व सुखसमय बनानें की शिक्षा प्रदान की है। मानव जीवन में आनें वाली तमाम कठनॅाईयों से कैसे पार पाया जाय और फतह हासिल की जाय  ? इसका उपचार भला बापू के दर्शन के अलावा कहॉ मिलगा ? वे महज भाषण देंनें/व्याख्यान करनें, अथवा मुॅह से बोलनें वालों में से नहीं थे ? बल्कि वे ’कर्म’ और ’आचरण’ में बराबरा महत्व देंनें वाले बापू थे। यही कारण की वे बोलते थे/ सिखाते थे पहले स्वयं उसका अनुकरण करते थे। जिसे उनका कटू आलोचक भी स्वीकार करता है। बापू स्वावलम्बन, श्रम, सत्य अहिंसा को अपना हथियार बनाया। महात्मा गाँधी का विचार था, की जो लोग शारीरिक श्रम के बिना भोजन करते है, वे अनीति का भोजन करते हैं, ’शारीरिक श्रम’ और ’स्वावलम्बन’ के प्रति वे हमेशा सजग रहे।  ’सत्य’ और ’अहिंसा’ गाँधी जी के बेहद मजबूत हथियार रहे। ’साध्य’ को पानें के लिए बापूजी ’साधनो’ की पवित्रता बात करते थे, किसी चीज को पानें के लिए वे ईमानदारी की बात करते थे, इसलिए स्वतंतत्रता ऑदोलन के दौरान उनके आचरण में कर्म मे, और वचन में कहीं भी कोई कोताही नही बरती ?  वे अंग्रेजो विरूद्व लडाई लडे, परन्तु उनके मन में कभी भी अंग्रेज अधिकारियों के लिए मन में कोई दुर्भावना नहीं रहीं ? गाँधी जी का विचार था अंिहसा कीं कर्म से ही नहीं मन से वचन से भी नहीं होंनी चाहिए, इसको उन्होंनें अपनें घोर विरोधियों के प्रति भी अपनाया यहॉ तक की अपनें निर्मम हत्यारें को भी माफ करनें साहसिक कार्य भी गाँधी जी किया, यह दुनियॉ का विरतम् उदाहरण ही हो सकता है।  राजनीति में रहते हुऐ भी बापू नें कोई भी महत्वपूर्ण पद न तो हासिल किया न तो इसकी चेष्टा की, और तो और स्वतंन्त्रता प्राप्ति के बाद भी राष्ट्र का कोई भी पद ग्रहण करनें से साफ इनकार कर दिया । इसके पीछे का था की वे राजनीति में ’सेवा’ और ’उपेक्षितों’ को उठानें के लिए आये हैं, जिसे उन्होंनें सिद्व कर दिया। महिलाओं के लिए बराबरी व विधवाओं विवाह, दलितोत्थान उनके कालजयी काम हैं। जो उन्हें ईश्वर की श्रेणी में ला कर खडा कर देता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बात की दाद देंनी चाहिए की उन्होंनें गाँधी दर्शन को थोडा, आत्म साथ करनें की कोशिश की हैं, भारत में स्वच्छता को जनऑदोलन बनानें का श्रेय नरेन्द्र मोदी को ही जाता है।  वे शुरू से ही गाँधी जी और सरदार पटेल जैसे महान् नेताओं के मार्ग पर चलनें का प्रयास अवश्य कर रहे हैं। गाँधी जी (जैसे ऊपर बताया जा चुका है) शूचित के प्रति बहुत सजग थे, फिर वह चाहे बाहरी हो अथवा ऑतरिक, निजी जीवन में हो अथवा सार्वजनिक जीवन में, ’स्वच्छता’ को लेकर गाँधी बहुत संजीदा थे। शुरूवाती दौर से ही प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी नें ’स्वच्छता मिशन’ को निश्चित रूप से आगे बढानें का काम किया है।  जिसका नतीजा ये हुआ की सार्वजनिक व सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों नें प्रधानमंत्री की बात को सूना गया, और अब पहले की अपेक्षा ये संस्थान काफी साफ-सूथरे नजर आनें लगे है, हालॉकि ’स्वच्छता मिशन’ को लेकर सरकारी बजट व्यवस्था भी कर दी गई है। परन्तु जब तक यह ऑदोलन जन सहभागिता से नहीं जुडेगा, इसकी सफलता की भविष्यवाणी संदिग्ध रहेगी। सरकारी कर्मकाण्ड महज बजट को ठिकानें लगानें के सिवाय कुछ भी नहीं होते ? 

’स्वच्छता’ का सीधा संबंध हमारे ’स्वास्थ्य’ को लेकर है, सीमित संसाधनों और बढती आबादी और उससे उत्पन्न होंनें बीमारियों की तादात में लगातार वृद्वि हो रही है। व्यक्ति अपनें को कितना भी ’स्वच्छ’ और ’गंदगी से दूर’ रहनें की कोशिश करे फिर भी वह बीमारी की चपेट में आयी ही जायेगा ? गत देहरादून में ’डेंगू’ नें कोहराम मचा दिया था, इसकी चपेट में ज्यादातर वे लोग आये जो गंदगी से दूर स्वच्छता के करीब रहते हैं, इससे राज्य को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ विकास के कार्यों में लेट-लतीफी भी झेलनीं पडी। अतः अभी गाँधीं जी के ’स्वच्छता’ अभियान को ओर अधिक व्यापक और मजबूती देंनें की जरूरत है।  ’पॉलिथीन’ जैसे भयावह पर्यावरण शत्रु लाख कोशिशों के बाद भी बाजार की रोनक बना हुआ है, जबकी वैज्ञानिकों नें इसके पर्यावरणीय नुकसानों कें बारे में काफी पहले अगाह कर दिया था, बावजूद फैक्टरियों में इसका उत्पादन बदस्तूर जारी है। जनसंख्या दबाव के कारण सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर वैसे दबाव बना हुआ है, ऊपर से रासायनिक, अजैविक पॉलीथीन आदि के कारण ये धरती लगातार नीरस और विरान होती जारी है।   जिससे पर्यावरणीय असन्तुलन की समस्या नीत्-नई समस्या पैदा कर रही है। गाँधी जी का कथन था, ’प्रकृति हमारी जरूरतों को तो पूरा करती है, पर लालच को नहीं’ मनुष्य के लालच को देखकर तो ऐसा लग रहा है कि ’प्रकृति’ उसके उपभोग के लिए ही बनीं है। आज के आधुनिकता और पश्चिम के अन्धानुकरण भरे जीवन में गाँधी जी हर बात प्रांसागिक, जिसे आत्मसाथ करनें की जरूरत है, सच्चे अर्थों तभी हम गाँधी जी को अपना सकेंगें, और जिस वर्षगॉठ को मनानें की बात हो रही है, वह तभी सफल मानीं जायेगी, जब उसका अक्षरसः पालन किया जाये।  जहॉ बाहर से लोग जितनें संपन्न और वैभवयुक्त दिखते हैं, वहीं अंन्दर से दुःखी मनःस्थिति से भरे होते हैं, वास्तव में ऐसा जीवन मृत्युतुल्य ही समझा जाना चाहिए ?

आज की राजनीतिक बिरादरी, सरकारी मशीनरी व शैक्षिणिक संस्थानों में दी जा रही शिक्षा का प्रतिफल अनेक सुविधाओं से लैस होंनें के बावजूद भी नतीजा शुन्य है। राजनीतिक चर्चा-परिचर्चाओं का स्तर तीव्र गति से अधःपतन की ओंर जा रही है, उससे ऊपजी  व्यवस्था/सोच से और नीतियों से किसी का भी भला नहीं होंनें वाला है। आज चुनावों में जीत हासिल करनें के लिए किन-किन चीजों का सहारा लिया जाता किसी से छुपा नहीं हैं ? अब राजनीति ’सेवा’ का नहीं ’ब्यापार’ का जरिया बन गया है। सरकारी नौकरियों/संस्थानों  में व्याप्त भ्रष्टाचार, लेटलतीफ, घूसखोरी और उदासीनता नें देश के विकास को अवरूद्व कर दिया है। जिस देश में महात्मा गाँधी जैसे व्यक्तित्व नें जन्म लिया हो व विश्वभर के करोडों अरबों लोग उन्हें अपना पथ प्रदर्शक मानते हों, उस देश का सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक जीवन मुल्यों में इतनीं गिरावट आना बेहद दुर्भाग्यपूर्णं है। गाँधी जी नें ’सत्याग्रह’ के माध्यम से बडी से बडी लडाई लडी, और जीती। महात्मा गाँधी नें ग्राम स्वराज्य की धारणा और मजबूती प्रदान की जिसके की प्रेरणा में आज ’त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था’ का गठन हो रहा है। बापू चाहते थे, एक गॉव एक ’राज्य’ ’देश’ की तरह की विकसित किया जाय, गॉव के लोंगों में निर्भीकता, आत्मविश्वास, स्वावलम्बन, मितव्ययिता और श्रम की भावना विकसित हो ताकि गॉव लोंगों को वही ’रोजगार’ मनोरंजन और मानव संसाधन की तमाम सुविधाऐं, शिक्षा, स्वास्थ्य, जैसी जरूरी चीजें मिल सके । गॉव के लोग अपनें श्रम से रोजगार उत्पन्न कर सके ? भले आज इस ’ग्राम स्वराज’ की अवधारणा भी राजनीति की भेंट चढ गई, पंचायत पदों पर वाले लोंगों की नजर सरकार से मिलनें वाली मोटे बजट पर होती है। गाँधी को समझने के लिए समग्र दृष्टिकोंण की आवश्यकता है, देश तभी प्रगति कर सकता है, जब बापू के बताये मार्ग पर चलनें का साहसिक प्रयास किया जाय । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कवायद निश्चित ही प्रसंशनीय है, किन्तु उसे और बढानें की बडी आवश्यकता है। तभी गाँधी जी 150 वीं वर्षगॉठ हमारे लिए महत्वपूर्ण होगी ।