’गैरसैंण’ पर, फिर सियासी दंगल

Publish 06-12-2018 20:42:09


’गैरसैंण’ पर, फिर सियासी दंगल

पैठाणी/पौड़ी गढ़वाल(देवकृष्ण थपलियाल):  उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी गैरसैंण में शिफ्ट करनें को लेकर दोनों प्रमुख सियासी  दलों (भाजपा और कॉग्रेस) की मंशा अब किसी से छुपी नही रह गई हैं। पिछले करीब दो दशकों का लम्बा इतिहास इस ’सियासी दगेबाजी’ का गवाह रहा है। ताजातरीन प्रकरण के बाद तो मानों अब देहरादून में बैठे इन सियासतदांनों के मंसूबों नें जनता की इच्छाओं पर पानीं ही फेर दिया हो ? इनके बयानों के मध्येनजर अब  किसी बात की कोई आशंका नहीं रह गई है, की इन हुक्मरानों में गैरसैंण के प्रति कोई ’सॉफ्टकोर्नर’ बचा हो ? अब यह जनता को तय करना है, गैंरसैंण को लेकर जो कहीं जा रहीं बातों में कितनीं सच्चाई है/थीं ? हर साल/हर सरकार द्वारा गैंरसैंण में लगाये जा रहे ’भण्डारे’ का औचित्य क्या है/क्या था ? क्या वो फिजूलखर्ची नहीं थी ? अगर पहाड की स्थाई राजधानी गैरसैंण (चन्द्रनगर) में बनानें की इच्छा ही नहीं है, तो इतनें समय तक उसका पक्षाकार बननें का नाटक क्यों किया जाता रहा ? गैरसैंण के नाम पर जो भी राजनीतिक आयोजन सम्पन्न किये जा रहे हैं, कम से कम उन्हें तो होंनें दीजिए ! इससे सत्ता में बैठे, नेता, अफसरों मंत्री, विधायकों को पहाड की हकीकत से रूबरू होंनें का मौका मिलेगा, साथ ही देर-सबेर नेताओं को राज्य की स्थाई राजधानी के बारे में सोचनें का मौका मिलेगा ।
     भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अजय भट्ट नें जिस तरह से अपनी बात कहीं, व नेता प्रतिपक्ष डॉ0 इन्दिरा हृदयेश व मंत्री डॉ0 हरक सिंह रावत नें जैसे उनके सुर में सुर मिलाया, बल्कि इनमें से एक नेता ने बडी बेबाकी के साथ गैंरसैंण को लेकर अपनीं अनिच्छा स्पष्ट रूप से जाहिर भी कर दी ? इससे बडा उदाहरण हमारे नेताओं की बेवफाई का और कुछ हो नहीं सकता ? गैंरसैण में आयोजित होंनें वाले कार्यक्रमों को ’भंडारे’ की संज्ञा देंना, वहॉ सुविधाओं के अभाव की बात करनें का साफ-साफ मतलब है, आम जनभावनाओं की राजधानी की उपेक्षा करना ? गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनानें जैसे अत्यन्त संवेदनशील मुद्दे को जिसको प्राप्त करनें के लिए यहॉ के सैकडों, हजारों, नौजवानों, महिलाओं, छात्रों व ऑदोलनकारियों नें सडको पर उतर कर लाठी-डंडों से लेकर जेल और भूखे रहनें और यहॉ तक की जीवन की शहादत तक दी हो, उस मुद्दे को दोंनों सियासी पार्टियों नें पिछले दो दशको से कभी कैबिनैट बैठकें, कभी सत्र आयोजित कर सैर सपाटे कर, सब्जाग दिखाये, जन अभिलाषाओं पर कुठाराघात करनें का काम किया, और अब कहा जा रहा है की गैरसैंण को महज ’ग्रीष्मकालीन’ राजधानी तक सीमित रहे ? जिस पर लगभग सभी सियासी दल सहमत लगते है ? लेकिन जनप्रतिनिधयों को ये सोचना चाहिए की राजधानी अगर जन ऑकांक्षाओं के मुताबिक गैरसैंण में स्थापित होती है, तो पहाड का हर घर समृद्व हा जायेेगा ।
 सवाल उठता है की इस गरीब राज्य के नौजवान डिग्रियॉ लेकर सडकों पर घूम रहे हैं, पलायन की मार पूरे राज्य पर इस कदर हावी है कि गॉव के गॉव बंजर होते जा रहें हैं, वहॉ की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक ढॉचा इस कदर खत्म गया है, की कोई पहाड में या अपनें गॉव, कस्बे में लौटनें की सोच भी नहीं सकता ? वह या तो जंगलीं जानवरों से परेशान रहेगा, या इन विकृत खण्डरों से भयभीत रहेगा ? इसके विपरित देहरादून, हल्द्वानी, रूद्रपुर, हरिद्वार जैसे शहरों का आकार ’दिन दूनें रात चौगुनें’ बढ रहा हैं, लेकिन मार उसी गरीब तबके के व्यक्ति पर है, जो संसाधनविहीन है, जो आर्थिक रूप से अक्षम है।  जिन पहाड के लोंगों नें राज्य की कल्पना कर अपनें और अपनें नौंनीहालों के विकास की राह देखी थी, वो ही आज ठगे महसूस कर रहे हैं। ऐसे राज्य में हुक्मरानों की इच्छा के मुताबिक दो-‘दो राजधानीं बनाना क्या औचित्यपूर्ण है ? इन ’राजाओ’ं को तो तथाकथित परिवर्तित जलवायु का आनंद मिलेगा, लेकिन यहॉ की गरीब जनता की गाढी कमाई का क्या होगा ? कितना व्यय भार आम जनता को सहन करना पडेगा ? अच्छा होता राज्य को उसके निवासियों के मुताबिक उन्हीं पहाडों के मध्य में स्थित ’गैंरसैंण’ नामक स्थान पर स्थाई राजधानी को सृजन हो गया होता/उसी दिशा में प्रयास कर हो रहा होता ।  
 विगत साल कॉग्रेस सरकार के रहते भाजपा नें ’प्राइवेट बिल’ के जरिये गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनानें की वकालत कर रही थी ? तो कॉग्रेस सरकार के दौरान वहॉ तथाकथित सुविधाओं को जुटानें का काम दिखानें का प्रपंच कर राज्य की जनता को गैरसैंण के समर्थन में होंनें दावा भरा जा रहा था। यहॉ विधान भवन के अलावा एक मिनी सचिवालय की भी मंजूरी की गई है, जिसके लिए बकायदा 43 करोड का बजट प्रस्तावित है, सरकार कह रही है की इसके लिए 3 करोड जारी भी कर दिये गये हैं, लेकिन अभी तक वहॉ काम शुरू नहीं हुआ ? कार्यदायी संस्था ’वैबकाश’ को या तो सरकार से कोई डर नहीं है, अथवा वह सरकार के इशारे पर इस निर्माण को जबरन पीछे धकेल रही है। वहीं विधान सभा भवन को तैयार करनें के बारे में कहा जा रहा है, की दूसरे प्रदेशों के विधान भवनों के सिटिंग प्लान का अध्ययन किया जा रहा है ? ये सारी बातें और काम आम जनता को बरगलानें के अलावा कुछ नहीं हैं ? वहीं वहॉ सत्र या कैबिनैट बैंठकें आयोजित करनें को लेकर फिजूलखर्ची, कर्मचारी व स्थानीय जनता को परेशानी होंनें का तर्क कहीं भी गले के नीचे नहीं उतर पा रहा है ?
 प्रदेश में प्रचंड बहुमत से बनी भाजपा सरकार और फिर केन्द्र में भाजपा सरकार की मौजूदगी के बाद भी ’डबल इंजन’ की स्थाई राजधानी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर इतनी हील-हवाली कहीं न कहीं संदेह पैदा कर रही है ? आज वहॉ जरूरी सुविधाओं का रोना रोया जा रहा है। एक वक्त वो भी था जब वहॉ सत्र और कैबिनैट की बैंठकें टैट और कालोनियों में संचालित हुई, बाद में भराडीसैंण में विधान भवन बन व विधायक हॉस्टल बनकर तैयार हुआ, तो ये उम्मीद होनें लगी थी की देर-सवेर पहाड के सपनों की राजधानी गैरसैंण बजूद में आ जायेगी ?  पिछले अट्ठारह सालों से बारी-बारी से दोंनों दलों नें सरकारें बनाई, शासन सत्ता का सुख भोगा परन्तु इस अहम विषय को नेपथ्य में खिसका दिया ? जनाकॉक्षाओं का बहलानें के लिए भले बीच-बीच में गैरसैंण-गैरसैंण खेलते रहे,  परन्तु नतीजा ’ढाक के तीन पात’ ही रहा ? क्योंकि इस काम के लिए दोंनों दलों के पास न तो कभी दृढ ’राजनीतिक इच्छा शक्ति’ ही थी, न हीं कोई ’पक्का विजन’ ही ? सही बात तो ये है की कोई भी सियासी दल इस सुविधा विहीन, नितांत पहाडी कस्बे में राजधानी बनानें के बिल्कूल खिलाफ है ? यह मुद्दा भले आम पहाडी जनमानस के सपनों के केंद्र में रहा हो परन्तु सियासी दलों के लिए सिवाय आफत के कुछ नहीं ? यहॉ तक की उत्तराखण्ड के वजूद की सबसे बडी पैरोकार का दम भरनें वाली ’उत्तराखण्ड क्रॉन्ति दल’ उक्रांद भी सत्ता की चमकदार सीढियों में ऐसे फिसली की वह अब वह अपनें ही बजूद को तरस रही है ?
 इसीलिए गैरसैंण को राजधानी बनानें को लेकर जनता की इच्छा के विपरीत इस ’काम’ में कॉग्रेस-भाजपा की अंदरखानें खुब यारी-दोस्ती है, जनता नाराज न हो जाय, जन-आकांक्षाओं का जनसैलाब सडको पर न फूट पडे, इसलिए ’गैरसैंण के नाम से कुछ न कुछ ’राजनीतिक शोशेबाजी’ होती रहे, इसके लिए दोंनों में भारी एकता है। इसके लिए दोंनों दल अपनें कार्यकाल के बीच-बीच में गैरसैंण’ की माला को जपते हुऐ, जनता की ’मैमोरी’ को ताजा कर देते है।  साल 2013 में 14 फरवरी को मकर संक्रान्ति के पवित्र पर्व पर तत्कालीन कॉग्रेस सरकार के मुखिया श्री विजय बहुगुणा नें अपनें तमाम लाव लश्कर के साथ देहरादून से गैरसैंण पहुॅचकर कैबिनेट की बैठक आयोजित की। तो हर आमोखास में उम्मीद की किरण जगनें लगी, लोंगों में यह संदेश घर कर गया की सरकार गैरसैंण को नहीं भूली है ? उसके बाद तो मानों ’गैरसैंण एपिसोड’ के कई सीरीज देखनें मिले ? किसी नें कैबिनैट बैंठकें तों किसी सरकार नें ग्रीष्मकालीन/शीतकालीन सत्र आयोजित कर सपनें दिखानें, दिग्भ्रमित करनें की राह पकडी ?
वर्तमान भाजपा सरकार नें इसी साल 20 मार्च से 28 मार्च 2018 तक शीतकालीन सत्र आयेजित कर जनता में यह भ्रम फैलानें का काम किया की वह गैरसैंण को लेकर गंभीर है ? इससे पहले जनता की भावनाओं को कैश करनें गरज से इस कस्बे का नाम भारतीय जनता पार्टी नें गैंरसैंण से बदलकर, पहाड के महान स्वतंन्त्रता सेनानी व समाजसेवी चन्द्रसिंह गढवाली के नाम से ’चन्द्रनगर’ कर दिया, (जो भले आज चलन में न हो) परन्तु आमतौर ’’नाम’’ की राजनीति करनें वाली भाजपा से पूछा जाय की क्या इससे गढवाली जी का सपना पूरा हो जायेगा ? जिस व्यक्ति नें राष्ट्र और मातृभूमी की सेवा के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया था ? गढवाल जी तत्कालीन उत्तर प्रदेश की राजधनीं को भी गैंरसैण में स्थापित करनें वालों में से भले वह ग्रीष्मकालीन राजधानी हीं सही, इस बाबत उन्होंनें तत्कालीन प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू से भी बात की थी, पंडित जी भी गढवाली जी की बात से सिदान्ततः सहमत थे, अगर सही मायनें भाजपा और कॉग्रेस गढवाली जी के आदर्शों को मानती है, तो गैरसैण को स्थायी राजधानी घोषित कर देंनी चाहिए ?  

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