विलुप्त होती प्याज ( Allium cepa ) की अनुवांशिक रूप से शुद्ध स्थानीय किस्म

Publish 12-02-2019 20:08:05


विलुप्त होती प्याज ( Allium cepa ) की अनुवांशिक रूप से शुद्ध स्थानीय किस्म

देहरादून (डा. राजेन्द्र कुकसाल)। उत्तराखंड राज्य को organic/जैविक प्रदेश बनाने का प्रयास  किया जा रहा है। कई जनपदो (पर्वतीय) विकास खण्डों को जैविक/organic क्षेत्र भी घोषित किया जा चुका है। जैविक खेती के लिये आवश्यक है कि हमारे पास उत्पादित की जानी वाली जैविक फसल का organic/जैविक बीज हो। दुर्भाग्य से हम आज पहाड़ी क्षेत्रों से अपनी परम्परागत कृषि से मिली प्राकृतिक धरोहरों को खोते जा रहे हैं। इन्हीं धरोहरों में एक है पहाड़ी प्याज बीज की स्थानीय किस्में। प्याज Allium cipa राज्य के पर्वतीय क्षेत्र की एक महत्व पूर्ण व्यवसायक फसल है जिसका उत्पादन यहां कई पीडियों से हो रहा है। प्याज का बीज यहां का कृषक यहीं उत्पादित प्याज कि फसल से स्वस्थ एवं आकृषित प्याज के वल्वों/कन्दौ से उत्पादित करता आ रहा है, इस बीज उत्पादन में कृषक किसी भी रसायनिक खाद/ रसायनिक दवा प्रयोग भी नही करता है। यह बीज आनुंवाशिक रुप से शुद्द होता है।
 स्थानीय रुप से उत्पादित प्याज का बीज क्योंकि एक ही जलवायु में कई पीडियों से उगाया जा रहा है इस प्रकार यह बीज जलवायु के अनुकूल Acclimatized होता है। स्थानीय रूप से उत्पादित प्याज बीज से प्याज का उत्पादन अच्छा होता है  फसल पर  कीट व बीमारी का कम प्रकोप होता है,सूखा सहने की छमता अधिक होती है साथ ही उत्पादित प्याज़ फसल का भन्डारण कृषक वर्ष भर अपने घरों के ढैपरों (कमरे के अन्दर ऊपर बनी दुच्छत्ती) में करते आ रहे हैं।
विगत कुछ वर्षों से उद्यान विभाग/विभिन्न परियोजनाओं एवं स्वयंम सेवी संस्थाओं द्वारा उन्नतशील किस्मों के नाम पर कम कीमत पर या निशुल्क प्याज बीज का स्थानीय प्याज उत्पादको को वितरण किया जा रहा है। इन बीजौं से उत्पादित प्याज फसल मै प्याज़ बल्व/कन्द बनने से पहले ही bolting (फूल के डन्ठल) आने शुरु हो जाते है जिससे उत्पादन काफी कम होता है । फसल पर कीट व्याधि का प्रकोप अधिक होता है साथ ही फसल की भन्डारण छमता काफी कम समय के लिये होती है जिस कारण उत्पादित प्याज़ के कन्द शीघ्र ही सडने लगते है।यदि इन उत्पादित कन्दौ से स्थानीय कृषक प्याज बीज बनाने का प्रयास करता है तो क्षेत्र विशेष में उत्पादित प्याज बीज की आनुवांशिक शुद्दता समाप्त हो रही है तथा स्थानीय किस्म का पहाडी  प्याज बीज विलुप्त होता जा रहा है. वर्तमान में स्थानीय पहाडी प्याज बीज उपलब्ध न होने के कारण पहाड़ी क्षेत्रों में प्याज उत्पादन काफी घटा है। इसलिये आवश्यक है कि स्थानीय कृषकों द्वारा परम्परागत रुप से उत्पादित प्याज बीज जो की अधिक उपज देने के साथ क्षेत्र विशेष की जलवायु के अनुकूल है का उत्पादन बढ़ाया जाय जिससे प्याज की इन स्थानीय किस्मों का संरक्षण भी किया जा सके।
प्याज बीज उत्पादन--
उत्तराखंड में लगभग 4 हजार हैक्टेयर क्षेत्र में प्याज की खेती की जाती है इसके लिए लगभग 300 कुन्तल प्याज बीज की प्रति बर्ष आवश्यकता पड़ती है। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए लम्बी प्रकाश अवधि वाली प्याज (पहाड़ी प्याज ) के बीज से ही अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है। प्याज बीज उत्पादन हेतु स्थानीय प्याज बीज उत्पादित फसल से प्याज कन्दो को उनके रंग, आकार व रुप के आधार पर छांटते है। पुर्णत: पक्व, स्वस्थ एक ही रंग रुप के, पतली ग़र्दन वाली एवं 4.5 – 6.5 से0मी0 व्यास तथा 60-70 ग्राम वजन के कन्दो को बीज उत्पादन हेतु रोपण के लिये चुनते है। पर्वतीय क्षेत्रौ मै प्याज की फसल अप्रेल/मई में तैयार हो जाती है जिसे बीज हेतु कृषक अक्टुबर/नवम्बर तक भन्डारित कर सुरक्षित रखता है। प्याज बीज उत्पादन हेतु ऐसे खेत का चुनाव करें जहां पर पिछले मौसम मै प्याज की कन्द या बीज की फसल नही उगाई गयी हो तथा पानी की निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिये।बीज उत्पादन हेतु चयनित प्याज कन्दों को अच्छी तरह तैयार किये गये खेतों मै अक्टुबर/नवम्बर माह में रोपण करें। खेत की तैयारी के समय खेत मै 5-6 कुन्तल खूब सडी गोबर की खाद प्रति नाली की दर से मिट्टी में मिलायें।कन्दों का रोपण समतल क्यारियों मै 60x30 से0मी0 (लाइन से लाइन 60 से0मी0 तथा लाइन में कन्द से कन्द की दुरी 30 से0मी0) पर करते है। कन्दो को 6 से0मी0 की गहराई पर रोपित करें। एक नाली याने 200 वर्ग मीटर खेत के लिये 50-60 कि0ग्रा0 कन्दो की आवश्यकता होती है।
प्याज एक पर-परागित फसल है जिसमें मधु मक्खी या अन्य कीट परागण मै मदद करते है इसलिये बीज फसल उत्पादन हेतु न्यूनतम 400 मीटर कि अलगाव दूरी ( Isolation distance ) याने प्याज की एक किस्म से दूसरी किस्म कि दुरी 400 मीटर होनी चाहिये।  प्याज कन्दो को रोपण के बाद सिंचाई करते है। पौधौ को गिरने से बचाने के लिये बीज फसल में स्फुटन आरम्भ होने कि अवस्था में मिट्टी चठाते हैं।कन्दों की बुआई के एक सप्ताह बाद अंकुरण आरम्भ हो जाता है तथा लगभग 2½ माह बाद फूल वाले डंठल बनने शुरु हो जाते है‌ पुष्प गुच्छ बनने के 6 सप्ताह के अन्दर ही बीज पक कर तैयार हो जाता है। बीज वृतों का रंग जब मटमैला हो जाय एवं उनमें 10-15 प्रतिशत कैप्सूल के बीज बाहर दिखाई देने लगे तो बीज वृन्तौ को कटाई योग्य समझना चाहिये सभी बीज वृन्तौ को काटना चाहिये जिनमें 10-15 प्रतिशत काले बीज बाहर दिखाई देने लगे हों। 10-15 से0मी0 लम्बे डठंल के साथ पुष्प गुच्छौ को काटना चाहिये, कटाई के बाद बीज वृन्तौ को तिरपाल या पक्के फर्श पर फैला कर खुले या छायादार स्थान पर सुखाना चाहिये, अच्छी तरह सुखाये गये बीज वृन्तौ को डडों से पीट कर बीज को निकालते हैं, बीजौ से बीज वृन्तौ के अवशेष तिनकों डंठलौ आदि को अलग कर लेते है, सुखाने के बाद बीज को फफूदीं नाशक दवा से उपचारित कर उचित भन्डारण करें। एक नाली कास्त करने पर 10-12 कि0ग्रा0 प्याज़ बीज प्राप्त होता है।
प्याज़ की अधिक उपज लेने एवं जैविक खेती को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से स्थानीय रुप से उत्पादित चयनित प्याज कन्दौ से ही प्याज बीज का उत्पादन करने का प्रयास किया जाना चहिये  इस दिशा में विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा ने हिमोत्थान परियोजना के माध्यम से वीएल-3 स्थानीय चयनित  प्याज की उन्नत शील प्रजाति का उत्तरकाशी एवं बागेश्वर जनपदों के कुछ कास्तकारौ के यहां प्याज बीज उत्पादन की पहल की है। किन्तु यह प्रयास ना काफी है। विभिन्न संस्थाओं व उद्यान विभाग द्वारा भी जनपदों में स्थित कृषि विज्ञान केन्द्रौं की सहायता से स्थानीय उत्पादित प्याज की किस्मों से बीज उत्पादन हेतु कास्तकारौ को प्रेरित करना चाहिए जिससे स्थानीय रुप से Acclimatized जलवायु के अनुरुप तथा आनुवंशिक रुप से शुद्ध प्याज बीज का संरक्षण किया जा सके।

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