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    कब तक भाड़ में जाती रहेगी... भोली-भाली जनता

    28-10-2018 15:25:03

    देहरादून (प्रदीप रावत "रवांल्टा")।   भोली-भाली जनता जी...मेरा सादर प्रणाम स्वीकार करें। अरे मैं चुनाव नहीं लड़ रहा हूं। बस मन कर रहा था कई दिनों से कुछ बका नहीं था। सोचा बक देता हूं। लोग आजकल कड़क लिखने-बोलने के लिए बकना ही बोलते हैं। अगर आपको भी कड़क लिखने और बोलने की आदत है, तो छोड़ दो...वरना कल के दिन आप चुनाव में दो-चार वोट भी नहीं जुटा पाएंगे। खैर...जल्द मुद्दे पर लौट आते हैं। वैसे मैं आपको अपनी अक्ल ठिकाने लगाने की सलाह देना चाहता हूं। ब्वाडा ने फोन किया था...बोल रहे थे तेरी बोडी बीमार है...। तू ही मेरे बदले का बक दे जो बकना हो...।
    जो भी हो...ब्वाडा जी का आदेश है तो बकना तो पड़ेगा ही मेरा मतलब बोलना...। आजकल नगर पंचायत, नगर पालिका और नगर निगमों में संग्राम छिड़ा हुआ है। इस संग्राम को पक्ष और विपक्ष वालों ने देवा-सुर संग्राम में बदल डाला है। भोली-भाली जनता को ठगने के लिए कई तरह के परपंच रचे जा रहे हैं। एक दूसरे को देव और असुर बताने पर तुले हैं। ओ बात अलग है कि रात को सभी सुरा और मांस का भक्षण करते हुए असुर बन जाते हैं। आजकल तो सुबह तक मुहं से कई तरह की सुराओं की बास मार रही होगी। इनमें कुछ हरामी टाइप के और कुछ भोली-भाली जनता के बीच के होते हैं। मेरी चिंता भोली-भाली जनता है।  
    असल में ये जो चुनाव हैं...कई लोगों के लिए तो दारू पीने का प्रशिक्षण साबित होता है। नये-नये लौंडे आजकल दारू पीना सीख रहे हैं। कुछ को तो पहले नाम भी पता होते हैं, कुछ ऐसे हैं, जिनको पहली बार नाम पता चल रहे हैं...क्योंकि बंदा भोली-भाली जनता के बीच से निकलकर आता है। भोली-भाली जनता जो ठैरी। आजकल एक नंबर का लफंडर भी भोली-भाली जनता के आगे हाथ जोड़े खड़ा है। कुछ ने तो कार चलानी छोड़ दी...गले में उसके मालदार होने की पहचान मोटी सोने की चेन भी नदारद है। अब जनता भोली-भाली है...तो कुछ तो भोला बनना ही पड़ेगा।
    वैसे अभी हल खेत के किनारे पर ही है। खेत जोता नहीं गया। मैंने सोचा कि भोली-भाली जनता को चुनाव मैदान में उतरे शकुनियों से सावधान करा दूं...। अभी तो सभी असाधारण, साधारण नजर आ रहे हैं, लेकिन जैसे ही इनके हाथ सत्ता का चाबुक लगेगा...ये आपको हांकने लगेंगे। ये बहुत ही सिद्ध पुरुष होते हैं। भोली-भाली जनता को भाड़ में झोकते हुए इनको देर नहीं लगती। जरा संभलकर रहें...भोली-भाली जनता और उस जनता के ठेकेदारों तुम भी।
    जनाब बात मैं ऐसे ही हवा में नहीं कह रहा...। बताता हूं...। असल बात ये कि भोली-भाली जनता है... ना। इसको इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उनके शहर में क्या सुविधाएं हैं। भोली-भाली जनता को तो इस बात से फर्क पड़ता है कि बंदा पिछले चुनाव में हार गया था। इस बार जिता देते हैं बेचारे को। भोली-भाली जनता के बीच कुछ ऐसे भी होते हैं...हरे राम बिचारे ने भौत पैसा खर्च कर दिया...इसीको जिता देते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं, जो कहते हैं कि मेरी फलां बुआ को बेटा है, भतीजा है, भाई, जीजा है और भी। जैसे चाची के भाई की बुआ के छोटे भाई का बीच वाला लड़का। ये समझ में नहीं आता कि आखिर भोली-भाली जनता कब मुद्दों की बात करेगी। कब ये समझ में आयेगा कि हर नेता जीतने के बाद आपको भाड़ में झोंक देता है। संभल जाओ मुद्दों की बात करो और मुद्दों पर ही वोट की चोट करो...। बाकी आपकी मर्जी...। भाड़ जाना है या अपनी आड़ में रहना है।