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कौन कहता है कि राजनीति गन्दी है

21-12-2017 16:06:54


लेखक - अनूप थपलियाल
       आज जगह-जगह लोग मे कहते सुनाई पडते है कि राजनीति बहुत गन्दी है। राजनीति शब्द का प्रयोग एक अपशब्द की तरह किया जाता है तथा नेता का अर्थ कोई-कोई तो सर्वथा तुच्छशब्दों के साथ मिलाकर किया करता है। राजनीति का बहुत ही निम्न स्तर का स्थान देने में कोई संकोच नही किया जाता। क्या वास्तव में राजनीति इतनी गन्दी होती है या राजनेताओं के स्वार्थो के कारण सामान्य जनता राजनीति से घृणा करने लगी है।
      वास्तव में राजनीति कोई गन्दी या घृणास्पद नही होती है। हम भारतीय है और हमने कुशल राजनैतिक संचालन के कारण ही श्री राम तथा श्री कृष्ण को भगवान का दर्जा प्रदान किया है। श्री रार्म आर श्री कृष्ण के कुशल राजनीतिज्ञ होने और जनहित के लिए कार्य करने के कारण भारतीय लोग आज भी श्री राम और श्री कृष्ण को भगवान बनाकर अपने हदृय में अंकित किये हुए है तथा सुबह-शाम उनकी पूजा किया करते है। स्पष्ट है कि राजनीति कोई घृणित वस्तु नही है बल्कि अगर राजनीति को कुशल नेतृत्व और जनसमर्थन मिल जाय तो एक वनवासी भी राम राज्य का और एक ग्वाला भी हस्तिनापुर और द्धारका का अविष्कार जनता के लिए करने में सक्षम होता है। राजनीति शब्द ही अपनी गरिमा और महानता को प्रकट करता है। कुशल राजनेतृत्व की सर्वहित की कुशल नीति ही राजनीति कहलाती है। मगर आज जिस प्रकार राजनेतृत्व अकुशल और अकर्मण्य व्यक्तियों के पास चला गया है उसके कारण राजनीति को अगर कोई अपशब्द या घृणित कहता है तो कोई आश्चर्य नही होना चाहिए। प्रजातंत्रिक देश में अगर प्रजा राजनीति को घृणित समझती है तो मेरी दृष्टि में यह महान आश्चर्य का विषय अवश्य हैं।
       हमारे यहां  प्रजातंत्र है और हम स्वयं अपने लिए नेतृत्व चुनने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है। मगर आज हम जब स्वयं ही राजनेताओं और राजनीति को अपशब्द कहते है तब हम केवल अपने अपरिपक्व होने का प्रमाण ही दिया करते है। आज अगर राजनीति भ्रष्ट्र और स्वार्थी लोगों की गुलामी कर रही है इसका कारण स्वयं हम अर्थात् यहां की जनता है। हम ही एकमात्र कारण है प्रथम भी और अन्तिम भी। हम जब अपने नेतृत्व का चुनाव करते है तब हम आंख बंदकरके केवल चंद रुपयों और शराब इत्यादि के लिए स्वयं को बेच डालते हैं। हमारी कमजोरी है कि आज स्वार्थी और अकुशल लोग हमारा नेतृत्व कर रहे है। हर दृष्टि से हम स्वयं अपने अहित के जिम्मेदार है अतः हमे यह कहने का कोई अधिकार नही है कि राजनीति या राजनेता घृणित हैं। अगर आज राजनीति में स्वार्थी और अकुशल राजनेताओं को बोलबाला है तो उसके लिए जिम्मेदार हम स्वयं है। जरा ध्यान देकर सोचे कि राजनीति को व्यापार बनाने का एकमात्र कारण केवल और केवल हम स्वयं है। हम ही लोग है जो इन स्वार्थी लोगो के लिए घर-घर जाकर मतदान का आग्रह करते है और विरोधी दलों के लोगो से लडकर इन्हे जिताते भी है। फिर यही लोग विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री बनकर असेम्बली और पार्लियामेंट में जाते हैं। क्या हम लोग यह नही जानते है। हम लोग मतदान इन्हे क्यों दे ? कोई तो हमे 100 का नोट देता है या शराब देता है। साडी या कुमकुम लेकर भी हम लोग मतदान करते है। क्या हम ये नही जानते ? और क्या-क्या कहना ये लोग जातिवाद फैलाकर हम लोगो को आपस में लडाते है और हमारे ही हिस्से की रोटी नोंचते है। ये लोग हमे एकता की मिसाल तो कभी नही देते है बल्कि हमे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, एससी, एस.टी. कहकर आपस में बाटकर गर्व करते है। हमारे ही चुने हुए प्रतिनिधि हमें मानव नही कहते है अगर हम इनकी बातों पर गौर करे तो हम समझ सकते है कि हम डाक्टर, इन्जीनियर, गुण्डे, मजदूर, शिक्षित, अशिक्षित सब कुछ है मगर इनकी दृष्टि मे हम केवल मतदाता है इन्सान हममे से कोई भी नही है। जबसे हमने पैसे और शराब लेकर मतदान करना शुरू किया है तब से राजनीति में स्वार्थी और लालची लोग आने लगे है।
      अगर हम लोग बिना जात-पात या पैसा देखे बगैर किसी अच्छे व्यक्ति को अपना मतदान करते तो हम उससे पूछ सकते है कि जनहित के कार्य क्यों नही किये जा रहे है ? मगर जब तक हम शराब और साडी लेकर मतदान करते रहेगे तब तक राजनीति में ऐसे ही स्वार्थी और लालची लोग व्यापारी बनकर हमें खरीदने आते रहेगें।
      स्पष्ट है कि अगर आज हमारे जननायक स्वार्थी होकर अपना और अपने चाटुकारों का हित करने मे व्यस्त है तो उसका कारण हम स्वयं है। जब तक हम स्वयं अच्छे व्यक्तियों को मतदान करने के लिए एकजुट नही होगे ये हमे इसी प्रकार निरन्तर लूटते रहेगे और राजनीति का नाम पर कंलंक लगाते रहेगे।
    अब हमे स्वयं ही तय करना होगा कि हमें किसी भी व्यक्ति का प्रचार या समर्थन क्यों करना चाहिए चंद रु0 या शराब के लिये या अपने देश के विकास के लिए। जब देश का विकास करने वालो को हम अपना नेतृत्व सौपेंगे तभी हम स्वयं का विकास कर सकते है अन्यथा स्वार्थी नेता हमें इसी प्रकार काल का ग्रास बनाते रहेगे ।