हम आज भी विश्व गुरू हैं

Publish 22-12-2017 18:51:32


हम आज भी विश्व गुरू हैं


लेखक - अनूप थपलियाल


 पाचों महाद्धीपों मे स्थित विभिन्न देशों के प्राचीन साहित्य, धर्म, दर्शन, समाज, भाषा पूजा पद्धति, देवी-देवता, आदि का भारत के साथा अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन काल में विश्व का कोई भाग ऐसा नही था जहां भारतीय संस्कृति न पहुची हो और उसे अपनाया न गया हो। विश्व के मंच पर वैसे तो विभिन्न क्षेत्रो से कई महत्वपूर्ण संस्कृतियां आयी पर वे भारतीय संस्कृति जैसा सार्वभौमिक, सर्वकालिक और सर्वव्यापी प्रभाव न छोड सकी। भारत की संस्कृति आज भी हर-हर महादेव, हरे राम हरे कृष्ण नाम का संकीर्तन करने वाले विभिन्न पाश्चात्य देशों के अपेक लोगों के माध्यम से विश्वभर में जुडती ही जा रही है। आज भी जबकि भारत की संस्कृति पर न केवल राजनीतिक सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक साहित्यिक दृष्ट्रियो से ही नही वरन् मीडिया की ओर से भी निरन्तर चतुर्दिक हमले हो रहे है और सभी इसको दीन और मलीन बनाकर प्रस्तुत करना चाहते है। भारतीय संस्कृति अपनी विशिष्टताओ के कारण अन्य संस्कृतियों से स्वयं को अलग दिखा पाने मे समर्थ है बल्कि अन्य के समक्ष अपना थाल ऊचां करती जा रही है करती जा रही है और करती ही जा रही है।  आज विश्व पटल पर भारत की स्थिति अत्यधिक विवादास्पद है क्योंकि सम्पूर्ण विश्व जिस श्रेष्ठता को पाने के लिए दिन-रात प्रयत्नशील है। वह श्रेष्ठता यह आर्यभूमि बहुत पूर्व ही प्राप्त कर चुकी है। आज विश्व की प्रत्येक सभ्यता, संस्कृति, जाति, भाषा अन्ततः स्वयं ही भारत की सनातन एवं चिरकालीन ज्योति के समक्ष अपना मस्तक टेकती नजर आ रही है। सम्पूर्ण पृथ्वी हमारी अति प्राचीन एवं स्वस्थ भारतीय आर्य संस्कृति से ही फल प्राप्त करती रही है और निसन्देह अभी भी प्राप्त कर ही रही है। आज भी विश्व का श्रेष्ठ माना जाने वाला शोध संस्थान अपने दस्तावेजों की सुरक्षा के लिए महर्षि पाणिनि के सूत्रों का प्रयोग कर रहा है और मानव क्रिया-कलापों का  अंग बन चुके कम्प्यूटर के लिए श्रेष्ठतम भाषा संस्कृत है यह भी सिद्ध हो चुका है। सम्पूर्ण विश्व अपने विकास के हर क्षेत्र में उन्नति के लिए केवल और केवल हमारे ग्रन्थों पर आश्रित है। आज चाहे तो कोई कुछ भी कहे मगर हर विकसित मस्तिष्क यह मानता है कि सम्पुर्ण विश्व पर न केवल आर्य संस्कृति की स्पष्ट छाप है बल्कि समग्र विश्व सदा से आर्यवृत का श्रृणी रहा है और अनादि काल तक श्रृणी ही रहेगा। आज विश्व की समस्त संस्कृतियों का अगर अध्ययन किया जाए तो पूर्ण रूप से विश्व पर आर्य संस्कृति की स्पष्ट छाप का अनुभव प्राप्त हो जाता है।


      आज जितनी भी सभ्यतायें विश्व में है उन सबकी आधार और संरक्ष्क आर्यवृत की सभ्यता है। इतिहास का अध्ययन और मनन करने पर स्पष्ट मानस बन जाता है कि किस प्रकार आर्यवृत के श्रृर्षियों ने गहनतम और गूठतम विषयो को अपनी तीव्र बुद्धि द्धारा आसानी से सुलझाकर, वेदों पुराणो और अन्य ग्रन्थों मे संस्कृत भाषा में लिपीबद्ध करके रखा है। कोई भी विषय हो चाहे वह आध्यात्मिक ज्ञान हो या भौतिक ज्ञान, रसायनिक ज्ञान हो या जीव विज्ञान प्रत्येक क्षेत्र में आर्यवृत के लोगों ने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है और आज भी कर रहे हैं। ‘विश्व में ज्ञान-विज्ञान के किसी भी क्षेत्र में शीर्ष पर 40% भारतीय ही हैं’ अगर आप न्यायपूर्वक किसी भी कला, संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान का विश्लेषण करे तो आपको गर्व होगा कि वह केवल आर्यवृत के महान ग्रन्थों और शास्त्रों का अंशमात्र हैं। इस पवित्र और पावन भूमि की विषेषता महाभारत के एक श्लोक सेः- यथा समुद्रो भगवान यथा मेरूर्महागिरिः। उभौ चयातौ रत्ननिधि तथा भारतमुच्यते।।
अर्थात् जैसे भगवान समुद्र और हिमवान पर्वत दोनो ही रत्नों की खान है। वैसे ही भारत भी रत्नों से परिपूर्ण है। ‘महाभारत आदि, 56-77, पूना संस्करण’ 

To Top