गरीब संवर्णों को नौकरी चाहिए, आरक्षण नहीं

Publish 30-01-2019 23:30:16


गरीब संवर्णों को नौकरी चाहिए, आरक्षण नहीं

पैठाणी/गढ़वाल (देवकृष्ण थपलियाल):  भारतीय संविधान में 124 वॉ संशोधन कर, संसद नें गरीब तबके के, उन तमाम संवर्णों  को, (जिनकी सालाना आय आठ लाख से कम है) को सरकारी नौकरियों  और शैक्षिणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत के आरक्षण देंनें का प्रावधान सुनिश्चित किया है, जिसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15 में 15‐6 क्लोज जोडा गया है, जिसके मुताबिक राज्य और केन्द्र सरकार को इस संबन्ध में कानून बनानें के लिए स्वतंन्त्र होगी, संविधान के अनुच्छेद 16 में एक और बिन्दु जोड कर यह सुनिश्चित किया गया है की केन्द्र और राज्यों की सरकारें 10 प्रतिशत तक आरक्षण दे सकतीं हैं। इसमें यह भी स्पष्ट कर दिया गया है, यह आरक्षण प्रचलित ’आरक्षण के कोटे’ से बिल्कुल अलग होगा, अब सरकारी नौकरियों और शैक्षिणिक संस्थानों में 59 प्रतिशत स्थान रिजर्व होंगें। अभी देश में कुल में 49‐5 फीसदी ही आरक्षण की व्यवस्था थी, जिसमें अन्य पिछडा वर्ग को 27 फीसदी अनुसूचित जातियों को 15 फीसदी और अनुसूचित जनजाति को 7‐5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है।
 इससे पहले 1992 में कॉग्रेस सरकार नें आर्थिक रूप से निर्बल संवर्णों को सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण देनें का निर्णय लिया था, परन्तु संविधान में संशोधन न हों पानें के कारण यह देश की सर्वोच्च अदालत में टिक नहीं पाया, तब कोर्ट नें स्पष्ट किया था कि आरक्षण किसी भी सूरत में 50 प्रतिशत से अधिक नहीं बढाया जा सकता ?  इस फैसले का प्रभाव ये हुआ की आरक्षण के नाम पर होंनें वाली देशव्यापी राजनीति की धार कूंद होती चली गई, बावजूद आरक्षण को लेकर क्षेत्रीय और जातीय सूरमाओं नें कोई कोर-कसर नहीं छोडी ?
 भले संविधान निर्माताओं नें ये कभी नहीं सोचा होगा, कभी  ’आरक्षण’ ’राजनीति’ का सबसे मुफीद हथियार बनेगा ? जिसका उपयोग ’वोटों’ की फसल तैयार करनें में होगा ? यहीं कारण रहा की  सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान मोदी सरकार के कार्यकाल के ऐंन छोर पर ही नही लाया गया है, संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान के ऐंन आखिरी दिन पर लाया गया है, जिसे सभी प्रमुख सियासी पार्टियों नें असाधारण बहुमत के साथ पारित करवा कर, संविधान में संशोधन कर दिया, जबकी इस पर सभी प्रमुख सियासी दलों, राजनीतिज्ञों और देश के प्रबुद्व नागरिकों को ठंडे दिमाग से सोचनें समझनें का वक्त दिया जाना चाहिए था। अच्छा होता इस मसले पर देशव्यापी चर्चा होती, तभी इस पर कानून बनानें का निर्णय लिया गया होता ? लेकिन ’वोटों की आपाधापी में भलें किस सियासी दल के पास इतना वक्त था की वह संविधान संशोधन के इस गंभीर मसले पर थोडा ठहर करके विचार-विमर्श की बात करता ? सत्ता पक्ष से लेकर विपक्षी पार्टियॉ इसको लपकनें के लिए कहीं भी कमजोर दिखनें की फिराक में नहीं थी ? जबकी किसी भी वर्ग/क्षेत्र/समुदाय को आरक्षण प्रदान करनें से उसका भला होता हो, कहा नहीं जा सकता ?   

  जहॉ एक ओंर सरकारी नौकरियॉ लगातार सिमटती जा रहीं हैं, निजीकरण, तकनीकी, मशीनीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तारीकरण से मानव संसाधनों को सीमित कर दिया वहीं आजादी के सत्तर सालों के बाद भी हम, उस तथ्य पर अटके हैं, जिसको हमारे संविधान निर्माताओं नें हीं ’बडी अनिच्छा’ से ही संविधान में जगह दी, (वह भी महज 10 वर्षों के लिए) देश के प्रथम प्रधानमंत्री के समय बनीं ’काका कालेकर समिति’ नें पिछडे वर्गों को लेकर रिर्पोट दी थी, लेकिन सम्बन्ध में कहा जाता है, की स्वयं काका कालेकर जाति-वर्ग आधारित आरक्षण के पक्ष में थे, न प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ही न उस समय के दूसरे नेता ही । स्पष्ट है की वे वंचितों और पिछडें समूहों-वर्गों के लिए हर संभव कदम उठानें के प्रयास कर रहे थे। लेकिन आरक्षण को सामाजिक न्याय का स्थायी हथियार स्वीकारनें को तैयार नहीं थे ? एक लोक कल्याणकारी, समतामूलक और लोकतांत्रिक समाज के लिए वास्तव में यह प्रयास होंना चाहिए की किसी को भी आरक्षण की आवश्यकता ही न हो। समाज का हर व्यक्ति एक-दूसरे के प्रति स्नेह और संवेदनशील बना रहे उसके सूख-दुख में सहभागी बनें रहे, समाज और राष्ट्र की प्रगति के लिए कदम से कदम मिलाते निरन्तर आगे की ओर बढता रहे ?
 संविंधान में सवर्णों के लिए 10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था करना एक राजनीतिक पहल है। जिसके बिना पर भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी आगामी लोक सभा चुनावों की वैतरणी पार करना चाह रहे हैं। भाजपा को जिस काम के लिए 1014 में प्रचंड जनादेश मिला था वे काम तो नहीं हो पाये ? मसलन मंदिर निर्माण, विदेशों से कालेधन की वापसी हर नागरिक के खाते में 15 लाख रूपयों की बात केवल हवाई साबित हुई है, इस नाराजगी को भॅापते हुए सवर्णों को रिझानें के नाम पर ये ’मास्टर स्ट्रोक’ लगाया है। परन्तु सच ये भी है, कि भूमि अधिग्रहण और खाद्य सुरक्षा विधेयक 2014 के चुनावों में कॉग्रेस को कुछ नहीं दे पाये बल्कि  इतिहास की सबसे बडी हार हाथ लगी । अब मोदी का यह ’मास्टर स्ट्रोक’ भाजपा के लिए कितनी लहरें पैदा करेगा कहना मुश्किल है ? हालॉकि कुछ विशेषज्ञों में इसको लेकर भी संदेह है, ’इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार’ नाम से प्रसिद्व इस केस में उच्चत्तम न्यायालय नें कहा था कि आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना संविधान में वर्णित समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन है। आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान की विस्तृत व्याख्या करते हुए उच्चत्तम न्यायालय नें कहा था अनुच्छेद 16(4) में आरक्षण का प्रावधान समुदाय के लिए है, न कि व्यक्ति के लिए। आरक्षण का आधार आय और संम्पत्ति को नहीं माना जा सकता।
 लेकिन फिलहाल इस विवाद से दूरी बनाते हुए, इस पर विचार करना ज्यादा सम्यक होगा  की ऐंन चुनावों के नजदीक मोदी सरकार को ’आरक्षण’ का सहारा क्यों लेंना पडा ?  जबकी परम्परागत रूप से भाजपा आरक्षण की बहूत ज्यादा समर्थक नहीं मानीं जाती रही है, साल 2014 के चुनावों में उसकी मातृ संस्था आएसएस क प्रमुख नें इसकी खिलाफत कर समीक्षा करनें की बात कह डाली थी तब पार्टी नें चुनावों के मध्यनजर इससे किनारा करना ही मुनासिब समझा था ? परन्तु पार्टी की मंशा जगजाहिर हो गई थी ? पिछले दिनों हुऐ चुनावों में भाजपा का खिसकता जनाधार और कुछ माह पहले दलित उत्पीडन निरोधक कानून (एट्रॉसिटी एक्ट) में संशोधन पारित करनें के मोदी सरकार के फैसले से आम संवर्ण खासी नाराजगी में थे, यहॉ यह ध्यान देंना भी समीचीन होगा, भाजपा का वोट बैंक का बडा हिस्सा संवर्ण ही हैं, जो देश में महज 16-17 फीसदी के आसपास ही हैं, जिनकी  ज्यादात्तर सीटों पर असरदार भूमिका हैं। विगत साढे चार सालों से भाजपा का जनाधार सवर्णों से अलग-अलग कारणों से खिसका है ? मसलन उत्तर प्रदेश में ब्राहमण वोट अब धीरे-धीरे कॉग्रेस की ओंर आनें लगे थे, योगी सरकार द्वारा बा्रहमण अफसरों को तवज्जो नहीं दिये जानें के कारण ऐसी बातें सामनें आ रहीं थी वहीं प्रियंका गॉधी को पार्टी का महासचिव बनाकर उत्तर प्रदेश के ब्राहमण बाहुल्य क्षेत्रों में तैनाती से कॉग्रेस नें भाजपा के वोट बैंक को छिननें की कोशिशें की हैं। मायावती और अखिलेश यादव की जुगलबंदी से जो वोट विकास और मोदी के नाम पर छिटक सकते थे, उसकी सेंदमारी से भाजपा उत्तर प्रदेश में साल 2014 नहीं दोहरा सकती है।
उत्तराखण्ड की पॉच सीटों पर यद्यपि इस समय भाजपा का परचम लहरा रहा है, परन्तु इस बात की कोई गारण्टी नहीं है कि आनें वाले चुनावों में भी साल 2014 रिपीट होगा, वैसे भी ’ट्रेंड’ को देखते हुए, कतई नहीं कहा जा सकता है, की भाजपा प्रदेश में कोई बहुत बडी ’उपस्थिति’ दर्ज करा रही है, राज्य सरकार के कर्मचारी इस कदर नाराज हैं की वे सरकार से सीधे दो-दो हाथ करनें के मुड में हैं, इसलिए वे सरकार को चुनाव में आनें की धमकी दे रहे हैं  वही नौजवानों पिछले दो सालों से देहरादून की ओंर टकटकी लगाये बैंठें हैं, परन्तु सरकार नें एक नौजवान को नौकरी नहीं दी है, बल्कि कॉग्रेस सरकार के वक्त राज्य के विद्यालयों में लगाये गये करीब 5,000 गेस्ट टीचरों को दर-दर भटकनें के लिए मजबूर कर दिया है, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भाजपा बडे-बडे दावे करते आई है, परन्तु पिछले दो सालों में महिलाओं पर जिस तरह अत्याचार हुऐ, खुद भाजपा के एक बडे नेता पर महिला से बदसलुकी के आरोप लगें उससे तो ’सरकार’ नाम की किसी चीज का आभास नही होता है। बल्कि भाजपा अपनें नेता पक्ष में बडी निर्लज्जापूर्ण ढंग से खडी  दिख रही है। इससे ज्यादा कुशासन की बात और क्या हो सकती है ? वहीं गुटबाजी और धडों के बीच बॅटी कॉग्रेस पार्टी सरकार की कमजोरी का लाभ उठा पायेगी, कहा नहीं जा सकता है ? प्रदेश मे किसी तीसरी पार्टी की बात करना फिलहाल बेमानीं होगा, परन्तु ये जरूर है की भाजपा अथवा कॉग्रेस में पार्टी से अधिक उम्मीदवारों की काबिलियत पर ज्यादा दारोमदार होगा ? भाजपा के इस ’मास्टर स्ट्रोक’ से देश-प्रदेश के मतदाताओं पर ज्यादा प्रभाव इसलिए नहीं होगा क्योंकि राज्य और केन्द्र सरकार नें नौजवानों को रोजगार के नाम पर कुछ नहीं दिया है, भले एक ’नरेटिव‘ जरूर विकसित होगा जिसका लाभ भाजपा को मिलेगा।

 

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