मालु-सालु संस्कृति में हैं पॉलीथिन मुक्ति का उपाय

Publish 01-12-2018 19:29:05


मालु-सालु संस्कृति में हैं पॉलीथिन मुक्ति का उपाय

गढ़वाल/ उत्तराखंड(सुभाष चन्द्र नौटियाल):   पतित पावनी मोक्षदायिनी गंगा आज अपने ही अस्तित्व को जूझ रहीं है। गंगा रेत के टीले में तब्दील होती जा रही है। आने वाले समय में गंगा का दर्शन व गंगाजल से आचमन तक दूभर हो जायेगा। प्रदूषण अपने चरम पर है इसलिए गंगा ही नहीं वरन् अन्य नदियों का हाल भी गंगा के समान ही बहुत अच्छा नहीं हैं। धरती पॉलिथीन या प्लास्टिक से पटती जा रहीं है। महासागरों में अरबों टन प्लास्टिक जमा हो चुका हैं। स्थल से लेकर समुद्र तक हर तरफ प्लास्टिक है। पीने के पानी में हम प्लास्टिक पी रहें हैं, नमक में प्लास्टिक खा रहें हैं। सालाना एक लाख से अधिक जलीय जीव प्लास्टिक प्रदूषण से मर रहें हैं। इसका ताजा उदाहरण इसी महिने के शुरू में देखने को मिला, थाईलैण्ड में जहां एक व्हेल मछली 80 से अधिक प्लास्टिक बैग को निगलने से मर गयी। यह मात्र एक उदाहरण भर हैं। वास्तव में जल, जंगल और जमीन प्रदूषित हो चुके हैं। वायु प्रदूषित हो चुकी हैं। दुनिया की इस दुर्गति के लिए आखिर जिम्मेदार कौन हैं? विकल्प उपलब्ध होते हुए भी हम विकल्पों की तरफ देखना ही नहीं चाहते हैं। धरा में बढ़ते प्रदूषण के लिए मानव ही जिम्मेदार हैं। जिसने आधुनिक मानव बनने के लिए धरा से लेकर आकाश तक को प्रदूषित किया है।
 इस वर्ष पर्यावरण दिवस की थीम प्लास्टिक प्रदूषण को मात देने पर आधारित है। इस वर्ष का वैश्विक आयोजन कर्त्ता भारत है। भारत वैश्विक गुरू रहा है तथा जब-जब वैश्विक संकट उत्पन्न हुआ है तब-तक भारत ने समस्त विश्व का नई राह दिखायी है, वास्तव में पॉलिथीन की खोज अन्जाने में ही हुई थी। जब दो ब्रिटिश वैज्ञानिक एरिक फॉसेट और रेजिनाल्ड गिब्सन इंपीरियल केमिकल इडस्ट्रीज में 27 मार्च 1933 को इथाईलीन पर प्रयोग कर रहें थे, जब इथाईलीन में ऑक्सीजन के अणु मिल जाने से रातों-रात पॉलिथीन बन गया। दो वर्ष बाद उन्होंने पॉलिथीन बनाने के तरीके का ईजाद किया। तब दोनों वैज्ञानिक भी इस बात से अंजान थे कि जिस प्लास्टिक को उन्होंने मानवता के कल्याण के लिए बनाया है वह एक दिन पर्यावरण के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जायेगा।
 हिमालय की गोद में बसे उत्तराखण्ड में सदियों से मालु-सालु संस्कृति पुष्पित और पल्लवित होती रही है। प्रकृति से आत्मसात् करते हुए मालु-सालु संस्कृति ने वैश्विक मानव को जीने की राह बतायी हैं परन्तु आधुनिकता की चमक-दमक में हम इस संस्कृति को भूलते चले गये। आज जब धरती में प्रदूषण अपने चरम पर हैं तो मालु-सालु संस्कृति की प्रासंगिकता बढ़ गयी हैं। आज जब वैश्विक मानव पॉलिथीन मुक्ति के उपाय ढ़ूंढ़ रहा हैं तो उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति जो कि, मालु-सालु संस्कृति की प्रायः रही हैं। इसमें पॉलिथीन मुक्ति का आसान उपाय बताया गया हैं। मालु-सालु संस्कृति से आत्मसात् करते हुए पॉलीथिन से मुक्ति पायी जा सकती हैं। सिंथेटिक या कृत्रिम पॉलीमर की तुलना में प्राकृतिक पॉलीमर पेड़-पौधों व जीवों  से मिलता हैं। यह बहुत आसानी से नष्ट हो जाता है, तथा पर्यावरण अनुकूलन भी हैं। मिट्टी के बर्तन, भीमल के रेशे, भांग के रेशे, बांस, रिगांल, कपास, रेशम तथा मालू ,कनार, तिमला, केला आदि वृक्षों की छाल व पत्ते का उपयोग मालु-सालु संस्कृति में सदियों से होता आया है। बढ़ती व्यवसायिकता तथा भौतिक संसाधनों को जुटाने के लिए मानव की अंधी दौड ़ने मालु-सालु संस्कृति का भुला दिया है। इस सम्बन्ध में एक वाकया इतिहास में दर्ज हैं जब गढ़वाल राजा के सेनापति पुरिया नैथानी 1669 में जजिया कर माफ करवाने के लिए दिल्ली सुल्तान औरंगजेब के दरबार में हाजिर होते हैं तो उनकी वहां खूब भाव-भगत होती है परन्तु पुरिया नैथानी खाना खाने के बाद बर्तनों को फेंक देते थे।
 उनके इस व्यवहार से औरंगजेब बहुत नाराज होते हैं तथा उन्हें तुरंत दरबार में हाजिर होने के लिए संदेश भेजते हैं। औरंगजेब उनसे पूछते हैं कि हमने आपके भाव-भगत में कभी कोई नहीं की है फिर भी आप खाने के बाद गिलास और थाली को फेंक देते हो ऐसा क्यों? पुरिया नैथानी ने बहुत शालीनता से उत्तर देते हैं कि हम मालु-सालु संस्कृति के लोग हैं। जिन मालू के पत्तों में हम एक बार खाना खा देते हैं उन्हें दुबारा उपयोग नहीं करते उसी प्रकार मिट्टी के गिलास या कुल्लड़ का भी एक बार ही उपयोग करते हैं। हमारे पास तो खाना बनाने के लिये मिट्टी के बर्तन तथा खाना परासने के लिए मालू के पत्ते ही हैं। औरंगजेब, पुरिया नैथानी के जवाब से काफी प्रभावित होते हैं तथा पुरिया नैथानी के अनुरोध पर सुल्तान ने ना सिर्फ गढ़वाल राज्य के लिए बल्कि अवध, रूहेलखण्ड तथा बुन्देलखण्ड के मंदिरों से भी जजिया कर माफ करवा देते हैं।
 वास्तव में मालु-सालु संस्कृति प्रकृति के सदा निकट रही है। इस संस्कृति ने प्रकृति का निम्नतम दोहन कर अधिकतम संरक्षण किया हैं, यही कारण हैं कि आज हमारे जंगल सुरक्षित हैं।जलसंरक्षण तथा पर्यावरण संरक्षण के लिये यहां लोकनीति बनी हुई है, जिसका पालन लोग सदियों से करते रहे हैं।
यहां 71फीसदी भू-भाग वनीय हैं ,मालु-सालु संस्कृति के प्रभाव के कारण ही आज इस क्षेत्र में वन तथा वन्यजीवों के प्रति आत्मीयता का भाव रहा हैं तथा इसी कारण यहां जंगल सुरक्षित रह पाये हैं। भले ही भोगवादी संस्कृति के बढते प्रभाव के कारण यह क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा है परन्तु फिर भी आज, जब पूरी दुनिया प्रकृति का अधिकतम दोहन कर रही है तो भी इस क्षेत्र के निवासी आज भी प्रकृति संरक्षण के लिये तत्पर हैं। भले ही सरकार की बेरूखी के कारण मासूसी का भाव जरूर हैं।फिर भी प्रकृति संरक्षण का भाव कम नहीं हुआ है।आज मालु-सालु संस्कृति पर गहन शोद्य की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
राज्य तथा केन्द्र सरकार को इस पर गहनता से विचार करना चाहिए।यदि धरती को बचाना है तो मालु-सालु संस्कृति का प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है ताकि विश्व में अधिक से अधिक लोग इस संस्कृति को अपना कर पर्यावरण संरक्षण वादी बन सकें।

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