आधुनिकता के नाम पर नग्नता अपनाते भारतीय

Publish 25-12-2017 19:13:00


आधुनिकता के नाम पर नग्नता अपनाते भारतीय

 आज एक ओर तो हमारी पुरानी संस्कृति और सभ्यता है और दुसरी तरफ युरोपीयता के तथाकथित सुधार, जो दूषित शिक्षा के माघ्यम से हमारी नीव तक में घुस चुके हैं। आज का शिक्षित वर्ग कहता है कि युरोप की भाषा खान पान और सभ्यता को अपनाकर हमारा राष्ट शक्तिशाली बन सकता है। और हमारी तेजोमय भारतीय संस्कृति कहती है कि जब तक हम युरोपी सभ्यता और संस्कृति से दूर थे तब तक हम विश्व में सर्वश्रेष्ठ थे। विश्व गुरू थे। आज पाश्चात्य कुशिक्षा ने हमें बुद्धि एवं चरित्र से मलीन बना दिया है। खुद को शिक्षित कहने वाले युवक युवतियां आज दूषित शिक्षा कारण आधुनिकता के नाम पर जिस प्रकार अपने संस्कारों और चरित्र को खोते जा रहे है वह हमारे लिए एक गम्भीर चिन्ता का विषय है। आधुनिकता के नाम पर स्वंय को विलास भोग और दुसरों की इन्द्रीय तृप्ति की वस्तु बनाने में यह सुशिक्षित गर्व का अनुभव करने लगे हैं। खुद को सभ्य कहने वाले किस प्रकार सार्वजनिक मनोरंजन की वस्तु बनते जा रहें हैं स्वंय को पढा लिखा कहने वाले अधनंगे होकर या ऐेसे कपडे पहन कर जिनमें शरीर ढकने के स्थान पर और उत्तेजित दिखाई देता है अपनी बुद्धि और मलीन चरित्र का प्रदर्शन स्वंय कर देते हैं। मूर्ख इतना भी नहीं जानते कि अपने शरीर को वे केवल उधाड नहीं रहें है अपितु अपने पूर्वजो का अपमान भी भरे बाजारो में पूर्ण बेशर्मी के साथ कर रहें है। खुद को अधनंगा करके घूमते इन आधुनिक बुद्धिमानेा को इतना भी समझ में नहीं आता कि वस्त्रों का त्याग करने से आधुनिक बना जा सकता, विकाश किया जाता तो इनसे कहीं ज्यादा आधुनिक और विकसित तो सडको, खेतो में घूमते आवारा पशु हैं। जो सर्वत्र अपने अश्लील क्रिया कलापो से सार्वजनिक प्रदर्शन करते रहते हैं।


विचार करेा आज हम कैसी हास्यस्पद अवस्था में पहुंच चुके हैं। यदि कोई भारतीयता के अनुरूप  वस्त्र पहनता है तो उसे रूढीवादी कह कर उसका मजाक उडाया जाता हैै। किन्तु आद्युनिकता के नाम पर युरोप की नग्नता अपनाकर बाजार में घूमते कम चरित्रों को सुशिक्षित कहा जा रहा है। इस से बडी विडम्बना और क्या हो सकती है। नग्न शरीर वालों को शिक्षित कहने की यह प्रवृति हमारे लये हानिकारक है। कभी कभी तो लगता है कि हमारा चरित्र न तो शिक्षा में रह गया है न संस्कारों में - वह तो बस शरीर के वस्ता्रें को कम करने में रह गया है। हमारी वर्तमान सभ्यता न ज्ञान में है न बुद्वि में- वह तो केवल नग्नता में है । मुझे नंगा करो- मुझे नंगा करो यही आद्युनिकता के नाम पर आद्युनिक शिक्षितों का पूर्ण वर्णन है । स्पष्ट है कि पाश्चात्य शिक्षा आज भारत में ही भारतीयों को युरोपीयन बना रही है और अब नग्नता ही शिक्षा का और शिक्षितों का एकमात्र आदर्श रह गयी है। आधुनिकता के नाम पर अपनी दूषित मानसिकता और शरीर का प्रदर्शन करने वाले दया के पात्र है। वैसे भी शास्त्रों के अनुसार जो ईश्वर रूपी माता पिता से जन्म पाता है वह संस्कारिक बनता है और जिसका जन्म केवल कामुकता द्वारा होता है वह कुसंस्कारिक ही बनता है। अत हमारे चरित्र और हमारे कारण हमारे पूर्वजो के चरित्र पर कोई हीनता न आये इस विषय में सदैव सर्तक रहना चहिऐ।
हमारी कमी अशिक्षा है। फिल्मों और गीतों के माध्यम से कुछ कमचरित्र लोग समाज को कुशिक्षित करने में लगे हैं। पैसो के लिए इस प्रकार शरीर का प्रदर्शन करने वालों को क्या कहा जाता है इसको भलिभॉंति जानकर कुछ मूर्ख भी उनकी तरह बनते जा रहें है। सार्वजनिक स्थानों पर अर्धनग्न घूमते कुशिक्षितों और आवारा पशुओं में अब कोई अन्तर नही लगता है। मैं उनको हतभाग्य मानता हूँ जिन्होंने आधुनिक शिक्षा और विकास के नाम पर युरोप की नग्नता को अपना लिया है और उस पर वर्था गर्व करते है। अगर कोई ज्ञानी इन्हैं  सुसंस्कृत होने के लिए कहता है तो ये मूर्ख बडी बेशर्मी से अपने नग्न होने के कई कारण स्वंय अपने मुख से कहने में भी गर्व करते है। इस प्रकार आधुनिकता के नाम पर स्वंय को सार्वजनिक उपयोग की वस्तु बनाने वालो से मैं  केवल इतना कहना चाहता हॅू कि हम भारतीय अजेय चरित्र. रखने वाले पूर्वजो के वशंज है । हमें इसका गर्व होना चाहिए। क्यूं अपने पूर्वजों के सिंह जैसे चरित्र पर आज यूरोप के गद्ये की खाल का आवरण डालकर उनका अपमान कर रहै हैं। मत भूलो कि हमारी नारी की आर्दश सीता सावित्री दम्यन्ती हैं और पुरूषों के उपास्य सर्वत्यागी उमाशंकर हैं। मत भूलो कि हमारा जन्म दूसरों की इंन्द्रिय तृप्ति के लिये नही हुआ है। मत भूलो कि हमारा चरित्र हमारे पूर्वजों के अटल और अनूप चरित्र की छाया मात्र है। हम आधुनिकता के नाम पर कुशिक्षा और हल्के चरित्र को अपनाकर अपने पूर्वजों का अपमान कर रहै हैं। इससे बडा हमारी मूर्खता का प्रमाण क्या होगा कि हम स्वयं आर्दश बनने में सक्षम हैं मगर हम नग्नता अपनाकर अपना और अपने पूर्वजों का उपहास उडा रहे हैं। स्वयं विचार करें कि हमें यूरोपीय नग्नता अपनाकर सर्वसुलभ और सस्ती वस्तु के रूप में समाज के मघ्य उपयोग होना है या अपने पूर्वजों का सा चरित्र अपनाकर बाकी समाज के लिए आदर्श बनकर प्रेरणा का स्रोत्र बनना चाहिए ।

लेखक - अनूप थपलियाल

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