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विवेकवान होते हुए भी मनुष्य ने पशुओं के कुछ गुण ग्रहण कर लिए

03-12-2019 12:58:15 By: एडमिन

लखनऊ/ उत्तर प्रदेश( रघुनाथ प्रसाद शास्त्री): इस धराधाम पर परमात्मा ने अनेकों प्रकार के पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं का सृजन किया साथ ही मनुष्य को बनाया। मनुष्य को परमात्मा का युवराज कहा जाता है यह बात ज्योतिष के जानकार रघुनाथ प्रसाद शास्त्री ने एक  धर्मिक कार्यक्रम  में बताई की इस धराधाम पर सभी प्रकार के जीव एक साथ निवास करते हैं, जिसमें से सर्वाधिक निकटता मनुष्य एवं पशुओं की आदिकाल से ही रही है। जीवमात्र के ऊपर संगत का प्रभाव बहुत शीघ्र पड़ता है। साथ-साथ रहते हुए पशुओं ने तो मनुष्य के बहुत से गुण स्वयं में समाहित कर लिये साथ ही विवेकवान होते हुए भी मनुष्य ने भी पशुओं के कुछ गुण अवश्य ग्रहण कर लिए हैं। आदिकाल से कुत्ते, बिल्ली, घोड़े एवं शेर आदि पशुओं के साथ जीवन बिताने वाले मनुष्य धीरे-धीरे उनके गुणों को भी आत्मसात करना प्रारंभ कर दिया। मानव के मन में ऐसी अनेक पशु प्रवृत्तियां प्रवेश कर गई जिन का विश्लेषण करना भी कठिन एवं हास्यास्पद लगता है। पूर्वकाल में हमारे पूर्वजों ने मनुष्यता के महत्व को जानते हुए मानवधर्म की नींव रखी थी, जिसमें एक दूसरे के सुख-दुख को जानना, उस में सहयोग करना तथा समाज को अपने साथ लेकर चलना मुख्य था। आज से पहले इतिहास को या पुराणों की कथाओं को पढ़ने से ज्ञात होता है कि इसी धराधाम पर अनेकों महामानव ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने स्वयं को ईश्वर का युवराज सिद्ध भी किया है। विवेकवान, धीर-गंभीर एवं कार्यकुशलता से समस्त मानव समाज को सफलता के उच्च शिखर पर पहुंचाने वाला एक मनुष्य ही था। सकारात्मक सोच के साथ सही दिशा में आगे बढ़ते हुए समाज को साथ में लेकर चलने वाले हमारे पूर्वज मनुष्यता का अप्रतिम उदाहरण थी, जिन के पद चिन्हों का अनुसरण करके मानव जाति ने विकास के अनेकों अध्याय लिखें, परंतु धीरे-धीरे समय परिवर्तित होता गया और मनुष्यों ने अपनी मनुष्यता का त्याग करके पशुता को ग्रहण करना स्वीकार कर दिया और मानव समाज अनेकों प्रकार की विसंगतियों से जूझने लगा।

 

 

हमारा मानना है कि आज समाज में मनुष्यता के दर्शन बड़ी कठिनता से होते हैं चतुर्दिक पशुता ही तांडव करती हुई दिखाई पड़ रही है। भेड़िए की तरह एक दूसरे पर गुर्राना, कुत्ते की तरह आपस में लड़ जाना और बिल्ली की भाँति यह सोचना कि मैं जो कार्य कर रहा हूं कोई देख नहीं पा रहा है, इसके अतिरिक्त घोड़े की भांति कामुकता एवं वासना आज चारों ओर दिखाई पड़ती है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य ने अपने स्वाभाविक स्वभाव मनुष्यता का त्याग करके पूर्ण रूप से पशुता को ग्रहण कर लिया है। कोई भी आज समाज में स्वयं को भेड़िया, कुत्ता, बिल्ली या घोड़ा कहलवाना कदापि पसंद नहीं करेगा तो आखिर ऐसा आचरण करके मनुष्य क्या सिद्ध करना चाहता है। ऐसे आचरण करने वालों से यही कहा जा सकता है कि आप मनुष्य हैं जिसे श्रेष्ठ का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा जाता है। राम, कृष्ण, गौतम, महावीर आदि महापुरुषों की संतान हो करके पशु पक्षियों का परित्याग करके मनुष्यता को स्थापित करने की आवश्यकता है। इतनी महानता के पात्र होते हुए भी यदि मनुष्य के मन में पशु प्रवृत्तियों का प्रवेश हो गया है तो उसका एकमात्र कारण है मनुष्य की असावधानता, आलस्य और प्रमाद, इसके साथ ही अपनी चित्तवृत्तियों पर स्वयं का अनुशासन न रह जाना भी कहा जा सकता है। कुछ पशु प्रवृति के मनुष्यों ने आज पूरे समाज का क्या हाल बना दिया है यह किसी से छुपा नहीं है। आज पुनः आवश्यकता है कि अपनी शक्ति को एवं स्वयं को पहचान करके मानवता के निर्माण में अपना योगदान प्रत्येक मनुष्य दें जिससे कि मनुष्य का चरित्र पुनः ऊंचा उठ सके। विश्व के विकास, मानवता के उत्थान के लिए मनुष्य को अपनी अनन्त शक्ति को पहचानना होगा और पशुता के आवरण को हटाकर आत्मस्वरूप का अनुभव करना होगा तभी पुनः मनुष्यता स्थापित हो पाएगी।