ज्ञान कुंभ: उच्च शिक्षा की रचनात्मक पहल

Publish 22-11-2018 17:54:22


ज्ञान कुंभ: उच्च शिक्षा की रचनात्मक पहल

पैठाणी /गढ़वाल (देवकृष्ण थपलियाल):  उच्च शिक्षा में नवाचार व गुणवत्ता सुधार को लेकर विगत 3-4 नवम्बर को हरिद्वार में ज्ञान कुंभ का आयोजन हुआ, जिसमें अनुमान था, की देश के ताकरीबन सभी (903) विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, प्रमुख शैक्षिणिक संस्थानों के मुखियाओं के साथ-साथ सभी राज्यों के उच्च शिक्षा मंत्रियों, सचिवों व तमाम शिक्षाविदों की उपस्थिति होगी, जिस कारण इस संख्या का अनुमान 25,000 के आसपास होंना बताया जा रहा था ? ’उच्च शिक्षा’ को लेकर देश में इस तरह की ’गंभीर पहल’ में यह संख्या अपेक्षाकृत काफी न्यून रहीं, कारण, जो भी रहा हो ? परन्तु वर्तमान में निरंतर गिरती उच्च शिक्षा की साख को बचानें के लिए  इस देशव्यापी चिंतन ’ज्ञान कुंभ’ का खासा महत्व है, जिसकी वजहें भी बहुत साफ हैं।
  विगत कई सालों से देश के आम विश्वविद्यालयों से लेकर नामचीन उच्च शैक्षिणिक संस्थानों का आचरण जिस तरह से सरेआम सडकों पर निलाम हुआ है, उससे उच्च शिक्षा से जुडे तमाम शुभचिंतकों में ही नहीं, अपितू जनसामान्य में भी इसकी गहरी प्रतिक्रिया हुई है ? ये सत्य है की विश्वविद्यालयों/कालेजों के प्रति आम जनमानस का नजरिया बेहद  सम्मानजनक, सूचितापूर्ण व स्तरीय नैतिक मानदण्डों का रहा है, लेकिन आज के हालातों नें इस ’विश्वास’ को बदला है, जो किसी भी सभ्य राष्ट्र के लिए कतई शुभ नहीं है ? क्योंकि शिक्षा ही वह माध्यम है, जिसके द्वारा राष्ट्र/समाज को प्रगति के मार्ग में अग्रसर होंनें का लाभ मिलता है। सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक समरसता, निर्धनता, अशिक्षा, गंभीर बीमारी, वैमनस्यता, और रूढिवादिता को समाप्त करनें और नये जीवन मूल्यों की स्थापना में ’उच्च शिक्षा’ का अहम योगदान है। दूर्भाग्य से उच्च शिक्षा के मंदिरों में इन सबके अलावा, वह सब कुछ हो रहा, जिसकी कभी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी ?  उच्च शिक्षा इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है, कि यहॉ पढनें वाला विद्यार्थी युवा ऊर्जावान होंनें के साथ-साथ तमाम समस्याओं की समझबूझ व नजरिया स्पष्ट करनें में सक्षम होता है, उसके मन में सकारात्मक राष्ट्रचिंतन व समाज के प्रति संवेदनशीलता का भाव निहित होंना चाहिए तभी देश और समाज का हित होगा ।  
 ’भारत तेरे टुकडे होंगें’, ’आजादी-आजादी’ के नारे किसी राह चलते राहगीर से नहीं आये, अपितु किसी प्रतिष्ठित उच्च शैक्षिणिक संस्थान के परिसर से आई है ! परिसर में   ’छात्र राजनीति’ के नाम पर जातिगत समूहों का बोलबाला, कालेज, विश्वविद्यालयों के परिसरों में राजनीति का सीधा हस्तक्षेप, नियुक्तियों में भाई-भतीजेवाद आदि वहॉ का वातावरण दुषित ही कर रहा है। हैदराबाद, जे0एन0यू0 में सिलसिलेवार तरीके से घटी घटनाओं से लोग अभी उभरे नहीं थे की, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कुछ शरारती कश्मीरी छात्रों द्वारा अलगाववाद की हवा देकर पडोसी पाकिस्तान के होंसले बुलंद करनें जैसा राष्ट्रविरोधी घृणित काम किया है, जो निश्चित रूप से निंदनीय घटना है, बाद में विश्वविद्यालय प्रशासन नें सम्बन्धित छात्रों को विश्वविद्यालय से निष्काषित करनें का निर्णय लेकर उन्हें दण्डित करनें का प्रयास किया ? परन्तु इस कृत्य से विश्वविद्यालय और देश की उच्च शैक्षिणिक व्यवस्था को शर्मशार होंना पडा ? इसी तरह दून विवि के छात्रों के बीच भी देशद्रोह की सुगबुगाहट की खबर नें सबको हिला कर रख दिया था। अगर इन संस्थानों में इस तरह की हरकतें होतीं रही हैं, तो ये समझा जाना चाहिए की कालेज/ विश्वविद्यालयी शिक्षा में सबकूछ ठीक-ठाक नहीं है। जो किसी भी राष्ट्रप्रेमी को परेशान, हैरान कर सकती है ?   
 आमतौर पर विश्वविद्यालय, कालेजों के प्रबंधन का सारा जिम्मा राज्य सरकारों के पास है, (देश में लगभग 70 प्रतिशत विश्वविद्यालय व 90 प्रतिशत कालेज राज्य सरकारों द्वारा संचालित होते है,) भले ही नीति-निर्माण व अनुदान के लिए देशव्यापी संस्था ’यू0जी0सी0 जैसे संस्थान है, इसीलिए उच्च शिक्षा को सही दिशा में निर्देर्शित करनें का दारोमदार भी राज्य सरकारों पर है। अपनें उद्घाटन भाषण में महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद नें शिक्षक-प्रबंधन-विद्यार्थी के त्रिकोणीय संयोग को मजबूत करनें की जरूरत बताई, जबकि यही पक्ष उच्च शिक्षा संस्थानों का सबसे धूंधला पक्ष रहा है। आज कालेज/विश्वविद्यालयों के प्राध्यापको के सैकडों पद सालों से रिक्त चल रहे हैं, और इनके पर बजाय नई नियुक्ति के ठेके अथवा नियत मानदेय पर शिक्षको से उच्च शिक्षा की वैतरिणी पार की जा रही है, बार-बार कहा जाता है, की नियुक्तियों के लिए अधियाचन ’राज्य लोकसेवा आयोग’ को भेजा है, परन्तु नतीजा फिर वही ’ढाक के तीन पात’ वाला सिद्व हो जाता है, संविदा/नियत मानदेय वाले भी सरकार पर दबाव बनानें लगते हैं, और अंततः ऐसे ही नियुक्ति पा जाते हैं, जिनका चयन पिछले दरवाजे से हुआ ? फिर आप इन शिक्षकों से निश्चत गुणवत्ता की बात कैसे कर सकते है ? हालॉंकि इस बिरादरी का बडा हिस्सा योग्य और ज्ञानशीलों का भी है, लेकिन लम्बे समय से इस कामचलाऊ-थकाऊ व्यवस्था को ढोते-ढोते उनका आचरण भी प्रतिकूल हो जाता है, जिसका स्वाभाविक प्रभाव विद्यार्थी और सम्पूर्ण उच्च शिक्षा व्यवस्था पर होता है, इसीलिए योग्य शिक्षकों का चयन उच्च शिक्षा की बडी समस्या है।  ज्ञान कुंभ के मंच से मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत नें इस दुर्दशा को बयॉ भी किया देश के 903 विश्वविद्यालयों व 39,000 कालेजों की तुलना में महज 3.6 फीसदी संस्थानों में ही शोध-अनुसंधान का काम चल रहा है, उन्होंनें विभिन्न देशों की शोध/अनुसंधान पर अपनें देश की धीमी प्रगति को लेकर अवश्य चिंता व्यक्त की ? तो वहीं जिन विश्वविद्यालयों को लेकर देश के नौजवान बहुत भरोसा रहा वहॉ की ज्ञान आधारित परिपाटी भी बहुत स्वस्थ नहीं है ?
हरिद्वार में ज्ञान कुंभ के मंच से एक तथ्य, जो प्रमुखता से उभरा, वह था, उच्च शिक्षा को ज्ञान, कौशल और तकनीकी के साथ-साथ नैतिक, चरित्रवान और मानवीय मुल्यों के प्रति संवेदनशील बनाना, विद्यार्थी के पास सद्गुणों का अभाव है, तो वह अस्तित्वविहीन है, यही बात यहॉ प्रमुखता से उभरी, जो समय की सबसे बडी जरूरत है, सभी नें उच्च शिक्षा के गिरते मुल्यों को स्वीकारा है ? और उसके संरक्षण पर जोर दिया,
 जिसका स्वागत होंना चाहिए। इस मंच पर उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति ही यह सब बतानें के लिए पर्याप्त थी की भारतीय उच्च शिक्षा को भारतीय संस्कृति, परम्परा, और मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदनशील होंना चाहिए, विश्व को गति के नियम, शून्य, दशमलव, पाई का मान की जानकारी भारत नें दुनियॉ को सदियों पहले दे दी थी,    महामहिम राष्ट्रपति नें भी  ’नैतिक शिक्षा’ को महत्वपूर्ण बतानें के पीछे का तर्क भी यही था कि जब तक आचरण का स्तर नहीं सुधरा, तब तक तकनीकी और अन्य ज्ञान का कोई महत्व नहीं है ? हर विद्यार्थी को प्रतिभावान करार देते हुए, उन्होंनें अपनें पूर्ववर्ती डॉ0 कलाम साहब की बात को आगे बढाया, उन्होंनें समुन्नत व अच्छी शिक्षा के लिए शिक्षक-प्रबंधन-विद्यार्थी के समन्वय को और मजबूत बनानें पर बल दिया है। जब तक विद्यार्थी और शिक्षक के भीतर प्रेम, त्याग, और संवेदनशीलता की भावना  जागृत नहीं होगी तब तक किसी अनुशासित शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती ?जब तक देश का नौजवान अपनीं संस्कृति, परम्परा को ठीक तरह से नहीं जान लेता तब तक राष्ट्र का विकास संभव नहीं है ? प्रदेश की राज्यपाल बेबीरानीं मौर्य के विचार भी इससें जुदा नहीं थे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष डी0पी0 सिंह नें भी शोध और सर्वे को बढावा देंनें के साथ-साथ स्थानीय समस्याओं पर भी शोध को बढावा देंनें की बात कही ?
ये अच्छी बात है की उच्च शिक्षा को लेकर समय-समय पर उत्तराखण्ड के साथ केद्र सरकार भी चर्चा-परिचर्चा के जरिये इसमें समयानुकूल परिवर्तन को लेकर गंभीर है, लेकिन ये गंभीरता महज नाम परिवर्तन तक सीमित न रहे (जैसे एनडीए सरकार शहरों, संस्थाओं का परिवर्तित कर रही/चुकि है) 1956 में स्थापित ’विश्वविद्यालय अनुदान आयोग‘ का बदलकर ’भारतीय उच्च शिक्षा आयोग’ कर दिया गया है, हालॉंकि कहा जा रहा है कि नये आयोग का पहला लक्ष्य ’न्यूनतम दखल, अधिकतम काम’ ’इंस्पेक्टर राज की समाप्ति’ और सबसे बडा काम की इसे अनुदान देंनें की व्यवस्था अलग से कर दिया गया है ? अगर ये काम अक्षरसः नहीं भी लागू होंतें हैं, तो भी यह उच्च शिक्षा में कुछ परिवर्तन और कुछ सुधार आनें की उम्मीद की ही जा सकती है।
मंत्री डॉ0 धन सिंह रावत की उच्च शिक्षा को पटरी लानें कोशिशें काबिले-ए-तारिफ हैं। उससे आम छात्रों में पढाई के साथ-साथ रचनात्मकता व सृजनात्मक का विकास होगा। विगत सत्र 2016-17 में अधिकॉश कालेज बिना मुखिया के चल रहे थे, इस कमी को दूर करनें के लिए विभागीय प्रोन्नति समिति का गठन कर इस कमीं को तत्काल पूर्ण कर दिया गया, अपितू श्रीनगर स्थित गढवाल वि0वि0 के केन्द्रिय विश्वविद्यालय बन जानें के उपरान्त, वहॉ वर्षों से संविदा पर अध्यापनरत अनुभवी शिक्षकों को महाविद्यालयों में तैनात कर दिया गया जिससे कर्मियों और छात्रों को दोंनों को लाभ हुआ, हर कालेज/विश्वविद्यालय में शौर्य दीवार का निर्माण, परमवीर चक्र से सम्मानित ये दिवंगत वीर आम छात्रों के प्रेरणास्रोत होंगें। प्रदेश के समस्त महाविद्यालयों में समान ’ड्रेस कोड’ लागू करके गरीबी-अमीरी, सामाजिक, आर्थिक विषमता को समूल नष्ट करनें का बडा प्रयास हुआख् जिसका पालन आज सभी कालेजों में समान रूप से संचालित हो रहा है। सुपर-100 (पहले सुपर-30) आर्थिक रूप से कमजोर पर मेधावी छात्र/छात्राओं के लिए शुरू की गई योजना में 100 बच्चों को (11 माह तक) निःशुल्क कोचिंग, भोजन, आवास, व्यवस्था के अर्न्तगत उन्हें आई0आई0टी0 व उसके समकक्ष परीक्षाओं की तैयारी करवानें का लक्ष्य है। एक अन्य योजना के अर्न्तगत सभी 13 जनपदों के 20-20 बच्चों को सिविल सेवाओं की तैयारी करनें का लक्ष्य रखा गया है।  निश्चित रूप से ये सभी क्रान्तिकारी पहल है, जिससे उच्च शिक्षा में उत्साह वातावरण बना है।  
ज्ञान कुंभ के मंथन के बाद उच्च शिक्षा में उसका संज्ञान लिया जाना चाहिए, तभी उसे सफल कहा जा सकता है। साथ ही इसी तरह की ऐकेडमिक पहल राज्य के हर जिले में आयोजित करनें से सभी छात्रों व प्राध्यापकों को अपनें-आप को अपडेट करनें में मदद मिलेगी।
 

 

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