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एक्सक्लूसिव : लोकतंत्र की जमीन पर नौकरशाहों की बादशाहत

29-05-2019 13:42:29

पैठाणी/गढ़वाल (देव कृष्ण थपलियाल): प्रदेश के कद्दावर नेता व कैबिनैट मंत्री डॉ0 हरक सिंह रावत राज्य की नौकरशाही को लेकर इन दिनों खासे खपा हैं, उनकी यह नाराजगी उनके विभाग के आलाधिकारियों तथा दूसरे विभागों के कुछ खास अधिकारियों की उनके आदेश की नाफरमानीं से है ? राज्य को खास पहचानें दिलानें में अहम भूमिका अदा करनें वाली आकूत वन संपदा की हिफाजत  की जिम्मेदारी संभाले मंत्री डॉ0 हरक सिंह रावत का जंगल आजकल धू-धू कर जल रहा है, जैसे-जैसे गरमीं की तपिस बढ रही है, वैसे-वैसे यह आग दावानल का रूप धारण कर   राज्य की बहुमुल्य प्राकृतिक संपदा स्वाहा कर रही है, जिससे वनों में पाई जानें वालीं विलक्षण जडी-बुटियों के साथ-साथ वे तमाम जीव-जन्तु, पशु-पक्षियों को असमय ही बडी मात्रा में हताहत व परेशान होंना पड रहा है, इनका प्रकृति और पर्यावरण के निर्माण में अहम योगदान है। ध्यान देंनें की बात यह भी है की यह योगदान महज राज्य की सीमाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव देशव्यापी है। अतः इन जीवधारियों का जीवन, इन्हीं प्रकृति, पेड-पौधों के सहारे अन्योंन्याश्रित व्यतीत होता है। ये निरीह जानवर जिस निर्दयिता से कल्ल होंतें हैं, पीडा से छटपटाते हैं, वे किसी भी सभ्य व मानवीय समाज तथा स्वस्थ पर्यावरण के लिए हानिकारक है।  अभी तक की रिर्पोट के मुताबिक सभी पहाडी जिलों में लगभग 1,000 हैक्टैयर जंगल इस दावानल की चपेट में आ चुके हैं। वन विभाग के ऑकडों के अनुसार बढती गरमी बीच अब तक लगभग कार्बेट रिर्जव टाइगर समेत 750 बार आग लगनें की घटनाऐं हो चुकीं हैं, जिसमें अनुमानतः 20 लाख रूपये का तत्कालिक नुकसान हो चुका है।
 दुःखद पहलू ये भी है, की यह सिलसिला इसी साल का नहीं है, बल्कि हर साल गर्मियों में यह अभागा मंजर हमें देखनें को मिलता है, जब प्रकृति प्रदत्त इस वरदान को हम यूॅ ही बरबाद होते देखते हैं, जिसे पीढियों से हमारे पूर्वजों ने बडे जतन से पाला-पोषा व संरक्षित किया था। लेकिन जिस सरकार से हमें इसकी हिफाजत की जिम्मेदारी सोंपीं है, ऐन वक्त पर ये सरकार के करिन्दे किसी न किसी बहानें से इन्हें आग के हवाले कर देते हैं। इससे बडी तकलीफदेह बात और क्या हो सकती है  ? वन विभाग के मुखिया श्री जयराज व अन्य जिम्मेदार विभागीय अधिकारियों का विदेश दौरा कई मायनों में दुर्भाग्यपूर्ण है ? और यही माननीय वन मंत्रीजी की नाराजगी का बडा कारण भी है। वन मुखिया श्री जयराज के अलावा राज्य के मुख्य वन संरक्षक विवके पांडे वन संरक्षक डॉ0 पराग मधुकर धकाते और प्रभागीय वनाधिकारी नितीश मणि त्रिपाठी दो सप्ताह की अध्ययन यात्रा पर यू0के0 और पोलेंण्ड की यात्रा पर गये हैं ? मंत्री जी का गुस्सा इन जिम्मेदार  अधिकारियों के वर्ताव व इजाजत को लेकर है, विभाग के मुखिया होंनें के नाते उनकी विदेश यात्राओं की स्वीकृति प्रदान करना न करना उनका काम है, परन्तु यह अधिकार उनसे छिन करके बाईपास हुआ, राज्य के मुख्यमंत्री नें उन्हे यह इजाजत प्रदान की है, जिसे मंत्री नें ’रूल्स आफ बिजनैस‘ के  खिलाफ कहा और अपना असंन्तोष स्वाभाविक रूप सरेआम किया  ?
 दूसरी शिकायत डॉ0 हरक सिंह रावत को कंडी रोड स्थित लालढांग-चिल्लरखाल मार्ग के निर्माण पर रोक लगाने से है ? यह मार्ग उनके वर्तमान विधान सभा क्षेत्र कोटद्वार में पडता है, बहुत संभव है की मंत्री जी नें चुनावों के दौरान इस मार्ग के निर्माण का वादा किया हो ? जिसको पूरा करनें के लिए वे वचनबद्व थे, उस मार्ग के निर्माण के लिए उन्होंनें लोक निर्माण विभाग को अधिकृत किया था, आदेशित किया था, परन्तु सडक का यह भाग राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) राजाजी नेशनल पार्क के बफर जौंन में है, जिससे कुछ पर्यावरणीय दिक्कतें हो सकती हैं, किन्तु डॉ0 रावत का मानना है की नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल नें इस मोटर मार्ग के निर्माण पर कोई रोक नहीं लगाई है, केवल कमेटी का गठन कर रिर्पोट देंनें की बात हुई है। परन्तु फिर भी अधिकारियों की मनमानी के कारण इसे बंद कर दिया गया है। जो की गलत है ? वन मंत्रीं डॉ0 हरक सिंह रावत के द्वारा खुलेआम उठाये गये सवालों का संज्ञान लेते हुए  राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत नें उनसे बातचीत करके फिलहाल यह मामला सुलझा दिया है । जिस सडक मार्ग को लेकर मंत्री महोदय उद्वेलित हुऐ थे, उस पर भी काम भी शुरू हो गया है, साथ ही जो अधिकारी विदेश यात्रा पर थे, वे भी वापस स्वदेश लौट आये हैं/आ जायेंगें ?
लेकिन मुख्य प्रश्न यह है की नौकरशाही का अपनें काम को लेकर इतनी लापरवाही व तानाशाही रवैय्या क्यों अख्तियार किया है । मंत्री हरक सिंह रावत के मातहत अधिकारीगण उनकी उपेक्षा कैसे कर सकते हैं ? ऐसा तो नहीं है, कि इतनें बडे नौकरशाहों को पता न हो की वे राज्य से नहीं देश से ही बाहर जा रहें और विभागीय मंत्री को पूछें तक नहीं ? माननीय मंत्री का मुख्यमंत्री और सरकार को निशाना बनाना स्वाभाविक है ? उन्होंनें इस्तीफे तक की धमकी देकर अपना आक्रोश व्यक्त किया है, अगर अधिकारी डॉ0 हरक सिंह रावत जैसे स्थापित राजनीतिज्ञ की अनदेखी कर रहे हैं, तो फिर बात को समझना चाहिए ?  देश और राज्य की नौकरशाही जन-प्रतिनिधियों की अवहेलना इसी तरह करती रही तो लोकतांत्रिक ढॉचा स्वमेय चरमरा जायेगा ? प्रजातंत्र जन इच्छा और जनमत से चलता है, ब्यूरोक्रेसी को इस तथ्य को अच्छी तरह से जान लेंना चाहिए, जनता पूरे पॉच साल के इंतजार के बाद अपनीं पंसद सरकार को चुनती है, और सरकार व जनप्रतिनिधि पूरी तरह जनता पर निर्भर होते हैं, अगर नौकरशाही अपनीं बादशाहत के साथ जनता नुमांइन्दों का सम्मान नहीं करती है तो यह लोकतांत्रिक ढॉचे के लिए शुभ संकेत नहीं है ?
अभी कुछ समय पहले कुछ पूर्व नौकरशाहो के एक समूह नें राष्ट्रपति को पत्र लिखकर  चुनाव आयोग की निरन्तर गिरती साख पर चिन्ता व्यक्त की, पत्र में उन्होंनें इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए इसे बडा खरा माना, परन्तु सवाल ये है, की यह खतरा उनको तब क्यों महसूस नहीं हुआ जब वे स्वयं राज्य और केन्द्र के बडे प्रतिष्ठानों को चला रहे थे, हर सरकारी प्रतिष्ठान में कितना भ्रष्टाचार है, तब क्या इन नौकरशाहों नें उसे रोकनें/उन्मुलन करनें प्रयास किया ? क्या उससे देश की प्रतिष्ठा को क्षति नहीं पहुॅची ? जो आज उन्हें चुनाव आयोग के दफ्तर में बैठे उनके कनिष्ठों द्वारा किया जा रहा है ? माननीय उच्चतम न्यायालय नें अंग्रेजी शासन द्वारा लागू पुलिस एक्ट 1861 में बदलाव व सुधार के निर्देश तो हैं, और इस निर्णय के प्रकाश में विभिन्न सरकारों नें पुलिस के सामंतवादी स्वरूप में बदलाव भी किये हैं । परन्तु ऐसे प्रयास  सिविल सर्विसेज कोड 1947 को बदलनें के लिए नहीं किए गये ? शायद देशवासी नहीं जानते कि यह यह सिविल सर्विसेज कोड 1919 ही है। जिसे इसी स्वरूप में स्वीकार कर लिया गया था। इसे स्वीकार करनें के पीछे यह सोच थी, कि यदि इस कोड के द्वारा अंग्रेजी नौकरशाही नें भारत को एक मजबूत प्रशासन तंत्र दिया है, तो वह स्वतंत्र भारत में भी उसी प्रकार काम करेगा, परन्तु ऐसा नहीं हुआ ? औसत नौकरशाही मौका मिलनें पर सिविल सर्विस कोड में दी गई अपार शक्तियों का उपयोग अपनें निजी स्वाथों की पूर्ति के करनें लगती है ? यहीं कारण है की कई बार कई अधिकारियों द्वारा ऐसे-ऐसे कृत्य किये जानें पर भी उन पर कोई कार्यवाही नहीं हो पाती है । क्योंकि एक नौकरशाह पर अभियोग चलानें के लिए सरकार से अनुमति अनिर्वाय होती है, इस अनुमति/स्वीकृति के लिए आवश्यक तथ्य, तर्क और प्रमाणों की आवश्यकताऐं होतीं है, जो स्वाभाविक रूप से जटील होती है, ताकतवर नौकरशाहों के मामले में यह प्रक्रिया और भी जटील होती है ? भारतीय नौकरशाहो की इस स्थिति को लेकर भारत के चीफ विजिलेंस एन विट्ठल नें कहा था कि राजनीतिज्ञों से ज्यादा नौकरशाह भ्रष्ट हैं, क्योंकि एक समय के बाद जनता राजनीतिज्ञों को हटा सकती है, परन्तु नौकरशाही अपनीं पूरी सेवाकाल तक यानी 30-32 वर्षों तक भ्रष्टाचार करता रहता है। ये अच्छी खबर है की भारत सरकार नें एक साल में 129 नौकरशाहों को भ्रष्टाचार  और नकारापन के कारण सेवानिवृत्त करके घर भेज दिया है । भ्रष्टाचार और अन्य अपराधों में 66 पूर्व अधिकारी जेलों में हैं। इसके अलावा भारत सरकार को ज्ञात हुआ है कि देश के अंदर 100 ऐसे आइएएस अधिकारी हैं जिनकी चल-अचल सम्पत्ति 800 करोड से ज्यादा है। साथ ही नौकरशाहों को अपनीं चल-अचल सम्पत्ति का ब्यौरा जो नियमित तौर से प्रत्येक साल सरकार को देंना चाहिए वे नहीं देते हैं ? दुसरी तरफ राजनीतिक दलों के ऐजेण्डे में कभी भी ब्यूरोक्रेसी में सुधार वाली बात रही ही नहीं है ?
उत्तराखण्ड में कुछ महिनें पहले एन0एच0 घोटाले को लेकर दो आई0ए0एस अधिकारियों गंभीर अरोप होंनें की वजह से मुकदमा चला, बडी मुश्किल से उन्हें नौकरी से कुछ दिनों के लिए सस्पेण्ड किया गया, परन्तु जल्दी ही बिना किसी ठोस सबूत के दोंनों अधिकारियों को  सेवा में  रख दिया गया ? उसी तरह शारदा चिटफंड में साक्ष्य मिटानें के आरोपी कोलकत्ता के पूर्व पुलिस आयुक्त राजीव कुमार को अभी तक कोई निश्चित सजा मुर्करर नहीं हो पाई, बल्कि गिरफ्तार करनें आई सीबीआई टीम को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नें किसी तरह से रोक दिया था ? फिलहाल यह रोक हट गई है, परन्तु यह सारा प्रकरण ये बतानें में सक्षम ब्यूरोक्रेसी किस कदर ताकतवर है ।
आजादी के इतनें वर्षों के बाद भी हम नौकरशाही के चेहरे को मानवीय नहीं बना पाये, तो इसका सीधा-सीधा दोष उनके चयन, प्रशिक्षण और उनके लिए बनाई गई, आचार संहिता अथवा नियम-कानूनों से है ? बिना उसमें व्यापक सुधार किऐ लोकतंत्र की सफलता की कामना नहीं की जा सकती है ? लोकतांत्रिक मुल्यों के संस्कारों को ग्रहण किये बिना  किसी भी व्यक्ति को नौकरशाही का पद प्रदान न किया जाय यह पहली शर्त होंनी चाहिए,   ?