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102 पेटी अवैध शराब के साथ आरोपित गिरफ्तार, वाहन सीज

06-12-2018 18:32:44

 

गढ़वाल /उत्तराखण्ड (देवकृष्ण थपलियाल)| अपनें देश के खाते में बडी से बडी उपलब्धि और हैरान करनें वाले करतब व अविष्कार ना भी हों, तो भी गम नहीं ? परन्तु इस बात का फक्र हर देशवासी को जरूर है,  की देश- दुनियॉ को मानवीय मूल्यों के प्रति सजग, संवेदनशील और ’जीवेत शरदं शतम्’ का पाठ पढानें वाला देश अपना ’भारत’ ही है। अर्थात 100 वर्षों तक शरद ऋतु की भॉति जीवन जीनें की संकल्पना भारतीयों को विरासत में प्राप्त है।  मानवीय मूल्यों और जीवन जीनें की सार्थक और सहज प्रेरणा देंनें की कला, व संस्कार भारत के संत-महात्माओं, महान् मनीषियों व प्रेरणादायी प्राचीनत्म धार्मिक ग्रन्थों से ही मिली है, इनकी प्रेरणा और प्रकाश से हमें जीवन में शान्ति तो मिलती ही है, साथ में जीवन को आगे बढनें की स्वस्थ प्रेरणा और सद्मार्ग भी मिलता है। ’गीता’ में लिखे एक-एक वाक्य हमें जीवन की तमाम दुरूहताओं से उभरनें में (प्राणी मात्र की) मदद करते है, ऐसी ही अनेक महान् रचनाऐं व ग्रन्थों से हमें जीवन को उदात्त, स्वस्थ, प्रसन्नचित और कर्मयोगी बनानें में सहयोग मिलता है, जिससे हमारे जीवन में प्रसन्नता का प्रकाश स्वयं ही लहलहानें लगता है। जब-जब हमारा जीवन बोझिल, नीरस और ऊबाऊ होंनें लगाता है, ये संत और प्राचीन ग्रन्थ हमें ऊर्जा से भर देते हैं, बेरंग जीवन में रंग भर देते हैं तथा नवीन जीवन जीनें की उम्मीदों के पंख लगा देते हैं। भारत से यह प्रेरणा विश्व के अनेक देशों और लोगों नें आत्मसात किया है, इसीलिए भारत ’’जगत गुरू’’ के नाम से विख्यात है। महात्मा बुद्व, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि अरविन्द व महात्मा गॉधी जी, जिन्होंनें देश को ही नहीं बल्कि विश्व के करोडों लोंगों को अपनें जीवन, कर्म और भावनाओं से प्रभावित किया, तथापि आज भी देश में कई लोग संत और समाज इन ऋषि-मनीषियों के बताये मार्गों का अनुसरण करते अपनें और दूसरों के जीवन को सहज, सरल और उपयोगी बनानें के लिए रात-दिन काम कर रहे हैं। इसीलिए आम लोंगों का जीवन आनंदमयी, निरोगी और उल्लासित है/होंना चाहिए, इन्होंनें जीवन जीनें की प्रेरणा न केवल गुफाओं व कंदराओं के अंदर समाधि लगाकर सिखाई, अपितु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आम लोंगों के बीच मिलजुल कर रहकर व्यतीत किया और प्रसन्नतापूर्वक जीवन का निर्वाह किया। इन्हीं महान संतो के कारण भारत को  “जगतगुरू“ की उपाधि से नवाजा गया।
 परन्तु भारतीयों की ’मनोदशा’ को क्या हो गया की वह निरन्तर अस्थिर और बैचेने होंनें लगी है ? दुनियॉ को सार्थक और सहज जीवन सीखानें वाले देश भारत की यह अर्न्तराष्ट्रीय रिर्पोट ’वर्ल्ड हैप्पीनैस रिर्पोट-2018’ इस देश के आम जनमानस के लिए खलबली मचा देंनें वाली है, यही नहीं वैश्विक खुशहाली इंडेक्स में 2017 के मुकाबले इस बार यह 11 स्थान नीचे लुढकी है, यानी पहले की से और नीचे की दयनीय स्थिति से भी और नीचे ? जो वाकई में परेशान करनें वाली खबर है। दुनियॉभर के देशों में इस महान् राष्ट्र के आम निवासियों की मनःस्थिति पाकिस्तान, बाग्लादेश, श्रीलंका भूटान और नेपाल जैसे छोटे-छोटे देशों से भी गई-गुजरी हो गई है, प्रसन्नता के मामले में हम आतंक और आपदा से ग्रस्त सोमालिया जैसे देशों से भी पिछडे हैं, पाकिस्तान जिसे आतंक और विध्वंसकारी देशों की श्रेणी में शामिल किया जाता है, जहॉ के लोंगों के रगों में हिंसा, मार-काट और आतंक फैलाना है, अमेरिका जैसा समृद्वतम् राष्ट्र भी उसे इस कुकृत्य के लिए अपमानित कर चुका है, और  हम बडे गर्व से ’आतंकवाद की पाठशाला’ से विभूषित करते है। वह भी हमसे अधिक प्रसन्न हो, अथवा हमारी ’हैप्पीनैंस’ का पायदान उससे भी नीचे हो, तो देश की तमाम तरह तरक्की से मोह भंग होंना स्वाभाविक है। आखिर इस बात पडताल होंनी ही चाहिए की दुनियॉ भारत को जहॉ महाशक्तियों कीे पंक्ति में देख रही है वही हम शोक सन्तप्त हो रहे इस देश के निवासियों की दुःखद मनः स्थिति को लेकर हैरान हैं, ? ऐसी सफलता और प्रगति का कोई मतलब भी नहीं है ? हम ऐसा क्या कर रहे हैं, जिससे हम इतनें अवसाद के शिकार होते चले जा रहे है, ’गीता’ जैसे अनेक ग्रन्थ जिनका उद्देश्य ही मानव मात्र/प्राणी मात्र के कल्याणार्थ है, क्या हमारी नई पीढी नें उससे प्रेरणा लेंना छोड दिया है ?  कुछ तो बात है जिसका मूल्याकन जरूरी है ? लेकिन इस अर्न्तराष्ट्रीय रिर्पोट तहकीकात भी जरूरी है।
193 (एक सौ तिरानबे) देशों के लोंगों की ’हैप्पीनैस’ को बिल्कूल वैज्ञानिक रीति-नीति से परखते हुए विशेषज्ञों द्वारा तैयार की जानीं वाली इस रिर्पोट पर तनिक भी शक-सूूबह की तनिक भी गुंजाइश नहीं है, संयुक्त राष्ट्र संघ के ’संस्टेनेबल डवलपमैट सॉल्यूशन नेटवर्क’ की हर साल प्रस्तुत होंनें वाली इस रिर्पोट में किसी भी तरह के घपले की तनिक भी आशंका व्यक्त नहीं की जा सकती है ?  यह रिर्पोट विशुद्व रूप से विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों व वैज्ञानिको के द्वारा तमाम वैज्ञानिक तर्कों और तथ्यों पर आधारित है, जिसमें सकल घरेलू उत्पाद (जी0डी0पी0), जनता को उपलब्ध सामाजिक और संस्थागत समर्थन, अनुमानित स्वास्थ्यपूर्ण आयू, सामाजिक आजादी, समाज में व्याप्त आपसी भरोसा, व उदारता और उस देश में भ्रष्टाचार के बारे में लोंगों की राय जैसे कई मामले इसमें शामिल हैं। जो भारतीयों को दुःखी और भयभीत दिखानें के लिए पर्याप्त है, लिहाजा इस रिर्पोट पर मीन-मेख निकालनें की बजाय अपनें गिरेवान में झॉकनें की ज्यादा जरूरत है, खासकर तब जब देश दुनियॉ की बडी शक्ति बननें की दिशा में अग्रसर हो ! प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भारत को विश्व विरादरी के बडे देशों में सूमार करनें की बातें कर रहे हों ? वह स्वागत योग्य है, पर ऐसे अवसादग्रस्त, चिंतित, मनःस्थिति से भरे लोगों के बनावटी देश को आगे ले जानें से बेहतर होगा, हम स्वस्थ, प्रसन्न और गरीब राष्ट्र को महत्व दिया दें ? वास्तव में देश नें चंद समय में ही प्रगति के अनेक कीर्तिमान गढे हैं, सूचना-टैक्नोलॉजी के क्षेत्र हो चाहे वैज्ञानिक प्रगति बात हो देश नें हर क्षेत्र में अपनीं धमाकेदार उपस्थिति दर्ज की है।
पिछले कुछ दशकों से हम परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं, उसमें शिक्षा के साथ-साथ टैक्नोलॉजी का भी महत्वपूर्ण स्थान है, निःसन्देह इन दोंनों नें ही आम भारतीय के जीवन को भीतर तक बहुत प्रभावित किया है, जिससे एक ओर हम तरक्की की ओंर बढ रहे हैं, लेकिन अपनें को ’मार्डन’ और आधुनिकतम दिखनें/बननें के चक्कर में अपनें प्राचीन जीवन मूल्यों को भी त्याग कर रहे हैं, उन्हें अपनानें को लेकर हम जरा भी सजग नहीं हैं, नयी पीढी के लोंगों में उनके प्रति एक नफरत और उन्हें दकियानूसीपन करार दिया जा रहा है ? जबकी ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति इतनी समृद्व है की अगर उसका अनुसरणत पूर्ण आमविश्वास और श्रृद्वा के साथ किया जाय तो ’जीवेत शरदम् शतम’ की परिकल्पना चरितार्थ हो सकती है, जिसका वास्तविक मतलब है, जीवन में प्रगति  के साथ-साथ सम्पूर्णता और आनंद का अनुभव किया जा सकता है, जरूरत है उसे अपनानें की।  ये अर्न्तराष्टीªय रिर्पोट हमारे कान जरूर खडे कर देती है ?  चाहे दोष हमारी शिक्षा प्रणाली का हो राजनीति में आ रही लगातार गिरावट का, टेलीविजन, सिनेमा, मीडिया, अथवा हमारे लाइफ स्टाईल का हो, इसकी पडताल अवश्य होनीं चाहिए, वर्ना हमारी तथाकथित समृद्वि, तरक्की और प्रगति का कोई अर्थ नहीं है ? दूसरे देशों की अच्छी बातों को ग्रहण करनें की मनाही नहीं है,  परन्तु अपनीं संस्कृति और मूल संस्कारों के प्रति भी तिरस्कार कहीं से भी उचित नहीं है, जिस देश के लोंगों में शिक्षा और संस्कार पैदा होते ही प्राप्त हो जाते रहे हों उस देश की शिक्षित जनता की हताश इस बात को पुख्ता करती है।